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Hindi Poem : एक मशहूर भोपाली शायर फ़ज़ल ताबिश

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आज से तीस-चालीस साल पहले का भोपाल आज जैसा भोपाल नहीं था। जगह-जगह मुशायरों (Fazal Tabish Hindi Poem) की महफिलें सजाता था, शेर सुनाता था और दाद पाता था। जवान, अधेड़ और बुजुर्ग, वह एक साथ कई चेहरों में नजर आता था। कहीं तो कच्चे दालानों में गॉव-तकियों से पीठ टिकाए ग़ज़ल के इतिहास को दोहराता था,कहीं अधेंड़ बनकर छोटे-बड़े चायखानों में ग़ज़ल और राजनीति के रिश्तों  पर नई-नई बहसें जगाता था और कहीं नौजवानों जैसी नई शायरी सुनाता था। उन्ही में से एक थे एक थे  भोपाल शहर के मशहूर शायर फ़ज़ल ताबिश जिनका जन्म 15 अगस्त, 1933 में हुआ था। वह मुसलमान थे, लेकिन उनकी मुसलमानियत में दूसरे धर्मों की इंसानियत की भी इज्जत शामिल थी। फ़ज़ल ताबिश अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी भी नहीं कर पाए थे कि अचानक सारा घर बोझ बनकर उनके कंधों पर आ गिरा। घर में सबसे बड़ा होने के कारण उन्होंने अपनी शिक्षा रोककर एक कार्यालय में बाबूगिरी करने लगे। निरंतर 15 बरस घर की ज़िम्मेदारियों में खर्च होने के बाद जो थोड़े-बहुत रुपये बचे थे, उससे उन्होंने उर्दू में एम.ए किया और हमीदिया कॉलेज में लेक्चरर हो गए। उनको उर्दू का बांका और कड़वा शायर कहा जाता है (Fazal Tabish Hindi Poem)। उनकी फक्‍कड़ जिंदगी और बेपरवाह तबीयत के बहुत किस्‍से हैं। उनकी शायरी का एक संग्रह ‘रोशनी किस जगह से काली है’ खासा चर्चित था।

फ़ज़ल ताबिश भोपाल के नौजवान प्रतिनिधि थे। वह बहुत हँसते थे। अपने हमउम्र में उनके पास सबसे ज़्यादा हँसी का भंडार था, जिसे वह जी खोलकर खर्च करते थे। फ़ज़ल ताबिश शेरी भोपाली, कैफ, ताज, दुष्यंत के बाद नई पीढ़ी के शायर थे। वह भोपाल की तहज़ीब, उसके मूल्यों के मेयर थे।

फ़ज़ल ताबिश का निधन आज से 24 बर्ष पूर्व 10 नवम्बर 1995 को हो गया था। चलिए उनकी याद में आज उनकी कुछ शायरियों को याद करते है।

लगातार हॅसने ने फ़ज़ल के चेहरे की शादाबी में इज़ाफ़ा किया था। उनका एक शेर बहुत मशहूर है-

न कर शुमार कि हर शै गिनी नहीं जाती

ये ज़िंदगी है हिसाबों से जी नहीं जाती

उनका एक शेर, जिसकी एक पंक्ति उनके संग्रह का नाम है, उनके काव्य चरित्र का बयान भी है-

रेशा-रेशा उधेड़कर देखो

रोशनी किस जगह से काली है

 

सहर फैला रही है अपने बाजू

मेरा साया सिमटता जा रहा है

 

हम दरख़्तों से फल तोड़ने के लिए

उनके लिए मातमी धुन बजाते नहीं

सुनो प्यार के क़हक़हों वाले मासूम लम्हों में हम

ऑसुओं के दियों को जलाते नहीं

 

भोपाली शायर फ़ज़ल ताबिश की कुछ मशहूर रचनाएं-

-हर इक दरवाज़ा मुझ पर बंद होता

-इस कमरे में ख़्वाब रक्खे थे कौन यहाँ पर आया था

-जिन ख़्वाबों से नींद उड़ जाए ऐसे ख़्वाब सजाए कौन

-ख़्वाहिशों के हिसार से निकलो

-मैं उस के ख़्वाब में कब जा के देख पाया हूँ

-न कर शुमार हर शय गिनी नहीं जाती

-रिश्‍ता खुजियाया कुत्ता है

-उसे मालूम है मैं सर-फिरा हूँ

-ये सन्नाटा बहुत महँगा पड़ेगा

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