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बुल्ले शाह की रचनाएं आप भी पढ़ें

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पंजाब में बुल्ले शाह (Famous Poetry Of Bulleh Shah) का नाम अग्रणी साहित्यकारों में लिया जाता है| बाबा बुल्ले शाह (1680 -1758) पंजाबी सूफ़ी काव्य के आसमान पर एक चमकते सितारे की तरह हैं। उन की काव्य रचना उस समय की हर किस्म की धार्मिक कट्टरता और गिरते सामाजिक किरदार पर एक तीखा व्यंग्य है।

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बुल्ले नूं समझावन आइयां

बुल्ले नूँ समझावन आँईयाँ भैनाँ ते भरजाईयाँ
‘मन्न लै बुल्लेया साड्डा कैहना, छड्ड दे पल्ला राईयाँ
आल नबी, औलाद अली, नूँ तू क्यूँ लीकाँ लाईयाँ?’
‘जेहड़ा सानू सईय्यद सद्दे, दोज़ख़ मिले सज़ाईयाँ
जो कोई सानू राईं आखे, बहिश्तें पींगाँ पाईयाँ
राईं-साईं सभनीं थाईं रब दियाँ बे-परवाईयाँ
सोहनियाँ परे हटाईयाँ ते कूझियाँ ले गल्ल लाईयाँ
जे तू लोड़ें बाग़-बहाराँ चाकर हो जा राईयाँ
बुल्ले शाह दी ज़ात की पुछनी? शुकर हो रज़ाईयाँ

जदों ज़ाहिर होए नूर होरी…

जदों ज़ाहिर होए नूर होरी,
जल गए पहाड़ कोह तूर होरी,
तदों दार चढ़े मंसूर होरी,
ओथे शेखी मेंहडी ना तेहँडी अय
मूँह आई बात न रेहँदी अय,
जे ज़ाहिर करां इसरार ताईं।
सभ भुल जावन तकरार ताईं,
फिर मारन बुल्ले यार ताईं।
एथे मखफ़ी गल सोहेन्दी अय,
मूँह आईं बात ना रेहँदी अय।

लाचारी और बेबसी को ग़ज़ल बनाने का नाम है राजेश रेड्डी

सानू आ मिल यार पियारया…

सानू आ मिल यार पियारया,
जद अपनी अपनी पै गई,
धी माँ नू लुट के लै गई,
मूह बाहरवीनां सदा पसारिया,
सानू आ मिल यार पिआरिया।
दर खुल्हा हशर अज़ाब दा,
विच हवियां दोज़ख मारिया,
सानू आ मिल यार पिआरिया।
बुल्हा शाह मेरे घर आवसी,
मेरी बल्दी भाह बुझावसी,
इनायत दम-दम नाल चितारया
सानू आ मिल यार पियारया।

इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने

दिल दी वेदन कोई ना जाणे, अन्दर देस बगाने,
जिस नूं चाट अमर दी होवे, सोई अमर पछाणे,
एस इश्क दी औखी घाटी, जो चढ़आ सो जाणे ।
इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने ।

आतश इश्क फ़राक तेरे दी, पल विच साड़ विखाईआं,
एस इश्क दे साड़े कोलों, जग विच दिआं दुहाईआं,
जिस तन लग्गे सो तन जाणे, दूजा कोई ना जाणे ।
इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने ।

इश्क कसाई ने जेही कीती, रह गई ख़बर ना काई,
इश्क चवाती लाई छाती, फेर ना झाती पाई,
माप्यां कोलों छुप छुप रोवां, कर कर लक्ख बहाने ।
इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने ।

हिजर तेरे ने झल्ली करके, कमली नाम धराइआ,
सुमुन बुकमुन व उमयुन हो के, आपणा वकत लंघाइआ,
कर हुण नज़र करम दी साईआं, न कर ज़ोर धङाने ।
इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने ।

हस्स बुलावां तेरा जानी, याद करां हर वेले,
पल पल दे विच दर्द जुदाई, तेरा शाम सवेले,
रो रो याद करां दिन रातीं, पिछले वकत वेहाने ।
इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने ।

Balkavi Bairagi की मनलुभावन कविताएं

इश्क तेरा दरकार असां नूं, हर वेले हर हीले,
पाक रसूल मुहंमद साहब, मेरे खास वसीले,
बुल्ल्हे शाह जो मिले प्यारा, लक्ख करां शुकराने ।
इश्क असां नाल केही कीती, लोक मरेंदे तअने ।

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