भारत भूषण पंत की मन लुभा लेने वाली नज्में

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पूजा भट्ट की फ़िल्म “धोख़ा” में लिखे अपने गीतों के लिए प्रसिद्ध भारत भूषण पंत (Famous Poetry Of Bharat Bhushan Pant ) का जन्म 03 जून 1958 ई० में हुआ था | इनका लेखन अत्यंत दिलकश है |

सोचने पर मजबूर करती कुंवर बेचैन की कविताएं 

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आईने से पर्दा कर के देखा जाए

आईने से पर्दा कर के देखा जाए
ख़ुद को इतना तन्हा कर के देखा जाए।

हम भी तो देखें हम कितने सच्चे हैं
ख़ुद से भी इक वअ’दा कर के देखा जाए।

दीवारों को छोटा करना मुश्किल है
अपने क़द को ऊँचा कर के देखा जाए।

रातों में इक सूरज भी दिख जाएगा
हर मंज़र को उल्टा कर के देखा जाए।

दरिया ने भी तरसाया है प्यासों को
दरिया को भी प्यासा कर के देखा जाए।

अब आँखों से और न देखा जाएगा
अब आँखों को अंधा कर के देखा जाए।

ये सपने तो बिल्कुल सच्चे लगते हैं
इन सपनों को सच्चा कर के देखा जाए।

घर से निकल कर जाता हूँ मैं रोज़ कहाँ
इक दिन अपना पीछा कर के देखा जाए।

Ramkumar Verma की मन झकझोरती दो कविताएं

रहगुज़र से बात कर…

कब तलक चलना है यूँ ही हम-सफ़र से बात कर
मंज़िलें कब तक मिलेंगी रहगुज़र से बात कर।

तुझ को मिल जाएगा तेरे सब सवालों का जवाब
कश्तियाँ क्यूँ डूब जाती हैं भँवर से बात कर।

कब तलक छुपता रहेगा यूँ ही अपने-आप से
आइने के रू-ब-रू आ अपने डर से बात कर।

बढ़ चुकी हैं अब तिरी फ़िक्र-ओ-नज़र की वुसअतें
जुगनुओं को छोड़ अब शम्स ओ क़मर से बात कर।

इस तरह तो और भी तेरी घुटन बढ़ जाएगी
हम-नवा कोई नहीं तो बाम-ओ-दर से बात कर।

दर्द क्या है ये समझना है तो अपने दिल से पूछ
आँसुओं की बात है तो चश्म-ए-तर से बात कर।

हर सफ़र मंज़र से पस-ए-मंज़र तलक तो कर लिया
देखना क्या चाहती है अब नज़र से बात कर।

धूप कैसे साए में तब्दील होती है यहाँ
इस हुनर को सीखना है तो शजर से बात कर।

ज़ख़्म पोशीदा रहा तो दर्द बढ़ता जाएगा
बे-तकल्लुफ़ हो के अपने चारा-गर से बात कर।

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं…

बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ की प्रतिनिधि रचनाएं

एक नए साँचे में ढल जाता हूँ मैं
क़तरा क़तरा रोज़ पिघल जाता हूँ मैं।

जब से वो इक सूरज मुझ में डूबा है
ख़ुद को भी छू लूँ तो जल जाता हूँ मैं।

आईना भी हैरानी में डूबा है
इतना कैसे रोज़ बदल जाता हूँ मैं।

मीठी मीठी बातों में मालूम नहीं
जाने कितना ज़हर उगल जाता हूँ मैं।

अब ठोकर खाने का मुझ को ख़ौफ़ नहीं
गिरता हूँ तो और सँभल जाता हूँ मैं।

अक्सर अब अपना पीछा करते करते
ख़ुद से कितनी दूर निकल जाता हूँ मैं।

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