ग़ुलज़ार की शानदार कविताएं

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किताबें!

गुलज़ार

किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से,(Gulzar Sahab Poetry)

बड़ी हसरत से तकती हैं.

महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं,

जो शामें इन की सोहबत में कटा करती थीं.

अब अक्सर …….

गुज़र जाती हैं ‘कम्प्यूटर’ के पदों पर.

बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें ….

इन्हें अब नींद में चलने की आदत हो गई है

बड़ी हसरत से तकती हैं,

जो क़दरें वो सुनाती थीं,

कि जिनके ‘सेल’ कभी मरते नहीं थे,

वो क़दरें अब नज़र आतीं नहीं घर में,

जो रिश्ते वो सुनाती थीं.

वह सारे उधड़े-उधड़े हैं,

कोई सफ़ा पलटता हूँ तो इक सिसकी निकलती है,

कई लफ़्ज़ों के मानी गिर पड़े हैं.

बिना पत्तों के सूखे ठूँठ लगते हैं वो सब अल्फ़ाज़,

जिन पर अब कोई मानी नहीं उगते,

बहुत-सी इस्तलाहें हैं,

जो मिट्टी के सकोरों की तरह बिखरी पड़ी हैं,

गिलासों ने उन्हें मतरूक कर डाला.

ज़ुबान पर ज़ायका आता था जो सफ्हे पलटने का,

अब ऊँगली ‘क्लिक’ करने से बस इक,

झपकी गुज़रती है,

बहुत कुछ तह-ब-तह खुलता चला जाता है परदे पर,

किताबों से जो ज़ाती राब्ता था, कट गया है.

कभी सीने पे रख के लेट जाते थे,

कभी गोदी में लेते थे,

कभी घुटनों को अपने रिहल की सूरत बना कर.

नीम-सजदे में पढ़ा करते थे, छूते थे जबीं से,

वो सारा इल्म तो मिलता रहेगा आइन्दा भी.

मगर वो जो किताबों में मिला करते थे सूखे फूल,

और महके हुए रुक्क़े,

किताबें माँगने, गिरने, उठाने के बहाने रिश्ते बनते थे,

उनका क्या होगा ?

वो शायद अब नहीं होंगे !

ख़ुदा

गुलज़ार

(Gulzar Sahab Poetry)

पूरे का पूरा आकाश घुमा कर बाज़ी देखी मैंने

काले घर में सूरज रख के,

तुमने शायद सोचा था, मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,

मैंने एक चिराग़ जला कर,

अपना रस्ता खोल लिया.

तुमने एक समन्दर हाथ में ले कर, मुझ पर ठेल दिया.

मैंने नूह की कश्ती उसके ऊपर रख दी,

काल चला तुमने और मेरी जानिब देखा,

मैंने काल को तोड़ क़े लम्हा-लम्हा जीना सीख लिया.

मेरी ख़ुदी को तुमने चन्द चमत्कारों से मारना चाहा,

मेरे इक प्यादे ने तेरा चाँद का मोहरा मार लिया

मौत की शह दे कर तुमने समझा अब तो मात हुई,

मैंने जिस्म का ख़ोल उतार क़े सौंप दिया,

और रूह बचा ली,

पूरे-का-पूरा आकाश घुमा कर अब तुम देखो बाज़ी.

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