Akbar Allahabadi की ग़ज़लें सुन वाह-वाह कर उठता था हर कोई

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अकबर इलाहाबादी (Akbar Allahabadi Top 3 Gazals) हमारे जैसे लाखों-करोड़ों लोगों के सबसे प्रिय शायर हैं| उनकी व्यंग्य रचनाओं ने न जाने कितने कवि और लेखकों को तंज़ की दुनिया में उतरने की प्रेरणा दी होगी| अकबर इलाहाबादी के अशआर ऐसे होते थे कि जिस शख्स को लेकर वो तंज़ (व्यंग्य) कसते थे वो भी उन्हें पढ़कर या सुनकर वाह-वाह कर उठता था और उनका मुरीद बन जाता था|

पढ़ें उनकी गज़लें (Akbar Allahabadi Top 3 Gazals) :

आइये पढ़ते हैं Rangeya Raghav की कविताएं 

हंगामा है क्यूँ बरपा

हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है

उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना
मक़सूद है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है

वां दिल में कि दो सदमे,यां जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है, अनवर-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है, कि हम हैं तो ख़ुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है

Ayodhya Prasad Upadhyay ‘हरिऔध’ की प्रमुख रचनाएं 

जो हो दीवाना किसी का 

समझे वही इसको जो हो दीवाना किसी का
‘अकबर’ ये ग़ज़ल मेरी है अफ़साना किसी का

गर शैख़-ओ-बहरमन सुनें अफ़साना किसी का
माबद न रहे काबा-ओ-बुतख़ाना किसी का

अल्लाह ने दी है जो तुम्हे चाँद-सी सूरत
रौशन भी करो जाके सियहख़ाना किसी का

अश्क आँखों में आ जाएँ एवज़ नींद के साहब
ऐसा भी किसी शब सुनो अफ़साना किसी का

इशरत जो नहीं आती मेरे दिल में, न आए
हसरत ही से आबाद है वीराना किसी का

करने जो नहीं देते बयां हालत-ए-दिल को
सुनिएगा लब-ए-ग़ौर से अफ़साना किसी का

कोई न हुआ रूह का साथी दम-ए-आख़िर
काम आया न इस वक़्त में याराना किसी का

हम जान से बेज़ार  रहा करते हैं ‘अकबर’
जब से दिल-ए-बेताब है दीवाना किसी का

कलेक्टरी का दीदार

मुंशी कि क्लर्क या ज़मींदार
लाज़िम है कलेक्टरी का दीदार

हंगामा ये वोट का फ़क़त है
मतलूब हरेक से दस्तख़त है

हर सिम्त मची हुई है हलचल
हर दर पे शोर है कि चल-चल

टमटम हों कि गाड़ियां कि मोटर
जिस पर देको, लदे हैं वोटर

शाही वो है या पयंबरी है
आखिर क्या शै ये मेंबरी है

नेटिव है नमूद ही का मुहताज
कौंसिल तो उनकी हि जिनका है राज

कहते जाते हैं, या इलाही
सोशल हालत की है तबाही

हम लोग जो इसमें फंस रहे हैं
अगियार भी दिल में हंस रहे हैं

दरअसल न दीन है न दुनिया
पिंजरे में फुदक रही है मुनिया

स्कीम का झूलना वो झूलें
लेकिन ये क्यों अपनी राह भूलें

क़ौम के दिल में खोट है पैदा
अच्छे अच्छे हैं वोट के शैदा

क्यो नहीं पड़ता अक्ल का साया
इसको समझें फ़र्जे-किफ़ाया

भाई-भाई में हाथापाई
सेल्फ़ गवर्नमेंट आगे आई

पाँव का होश अब फ़िक्र न सर की
वोट की धुन में बन गए फिरकी

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