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Hindi Poem : तीन बजे दिन में आ गए वे

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तीन बजे दिन में

आ गए वे

जब वे आए

किसी ने सोचा तक नहीं था

कि ऐसे भी आ सकते हैं सारस

तीन बजे दिन में आ गए वे

एक के बाद एक

वे झुंड के झुंड

धीरे-धीरे आए

धीरे-धीरे वे छा गए

सारे आसमान में

धीरे-धीरे उनके क्रेंकार से भर गया

सारा का सारा शहर

 

वे देर तक करते रहे

शहर की परिक्रमा

देर तक छतों और बारजों पर

उनके डैनों से झरती रही

धान की सूखी

पत्तियों की गन्ध

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अचानक

एक बुढ़िया ने उन्हें देखा

ज़रूर-ज़रूर

वे पानी की तलाश में आए हैं

उसने सोचा

 

वह रसोई में गई

और आँगन के बीचोबीच

लाकर रख दिया

एक जल-भरा कटोरा

 

लेकिन सारस

उसी तरह करते रहे

शहर की परिक्रमा

न तो उन्होंने बुढ़िया को देखा

न जल भर कटोरे को

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सारसों को तो पता तक नहीं था

कि नीचे रहते हैं लोग

जो उन्हें कहते हैं सारस

 

पानी को खोजते

दूर-देसावर से आए थे वे

 

सो, उन्होंने गर्दन उठाई

एकबार पीछे की ओर देखा

न जाने क्या था उस निगाह में

दया कि घृणा

पर एक बार जाते-जाते

उन्होंने शहर की ओर मुड़कर

देखा ज़रूर

 

फिर हवा में

अपने डैने पीटते हुए

दूरियों में धीरे-धीरे

खो गए सारस

 

(साभार:.केदारनाथ सिंह द्वारा लिखित कविताओं में से एक ‘अकाल में सारस’)

-Mradul tripathi

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