Hindi Poem : ख़ुद को आख़िर इतना मजबूर क्यूँ होने दें

0

ख़ुद को आख़िर इतना मजबूर क्यूँ होने दें,
जो मुक़द्दर में लिखा है बस वही क्यूँ होने दें।

हर जगह क्यूँ करें उस शख़्स को महसूस,
वो इंसान ही रहे उसे ख़ुदा क्यूँ होने दें।

आग ही सही पर यहाँ जलती रहे,
हम अपने दिल में अँधेरा क्यूँ होने दें।

रोज़ तस्वीर से उसकी क्यूँ मिलाएं आँखें,
एक ही हादसे को रोज़ क्यूँ होने दें।

पुराने खतों को उसके जला दिया है,
भर चुके ज़ख्मों को हरा क्यूँ होने दें।

बस एक लफ्ज़ ही रहे ज़िंदगी का मेरी,
उसके नाम को इसकी दास्ताँ क्यूँ होने दें।

अब इत्तेफ़ाक़न कभी कहीं मिल जाएगी तो,
पूछ लेंगे मोहब्बत से उसे दुबारा क्यूँ होने दें।

(साभार: सलमान फ़हीम द्वारा लिखित कवित ‘क्यूँ होने दें’)

जब संतावनि के रारि भइलि बीरन के बीर पुकार भइलि

-Mradul tripathi

Share.