भु धन दे निर्धन मत करना ,माटी को कंचन मत करना…..

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भु धन दे निर्धन मत करना.

माटी को कंचन मत करना…..

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निर्बल के बल रहो राम जी,

निर्धन के धन रहो राम जी.

मात्र न तन, मन रहो राम जी-

धूल न, चंदन रहो राम जी..

 

शुद्ध करो निज मन मंदिर को

क्रोध-अनल लालच-विष छोडो

परहित पर हो अर्पित जीवन

स्वार्थ मोह बंधन सब तोड़ो

जो आँखों पर पड़ा हुआ है

पहले वो अज्ञान उठाओ

पहले स्नेह लुटाओ सब पर

फिर खुशिओं के दीप जलाओ

 

जहाँ रौशनी दे न दिखाई

उस पर भी सोचो पल दो पल

वहाँ किसी की आँखों में भी

है आशाओं का शीतल जल

जो जीवन पथ में भटके हैं

उनकी नई राह दिखलाओ

पहले स्नेह लुटाओ सब पर

फिर खुशियों के दीप जलाओ

 

नवल ज्योति से नव प्रकाश हो

नई सोच हो नई कल्पना

चहुँ दिशी यश, वैभव, सुख बरसे

पूरा हो जाए हर सपना

जिसमे सभी संग दीखते हों

कुछ ऐसे तस्वीर बनाओ

पहले स्नेह लुटाओ सब पर

फिर खुशियों के दीप जलाओ

(इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त कविता )

-Mradul tripathi

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