Hindi Poem : गुज़रती रही सदियाँ बीतते रहे पल

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गुज़रती रही सदियाँ

बीतते रहे पल

आए

कितने ही दलदल

पर झेल सब कुछ

अब तक अड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

सर्दी की एक अँधेरी रात की बात है

अट्टालिकाएँ करें अट्टहास

गर्वित उनका हर उच्छ्वास

अनजान इस बात से कि

नींव बन पड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

 

देख नहीं पाते तुम

दामन छुड़ा हो जाते हो गुम

पर मैं कैसे बिसार दूँ

इंसानियत की कड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कमी नहीं थी

जब-जब हारा तुम्हारा विवेक

आए राह में रोड़े अनेक

तब-तब कोमल एहसास बन

परिस्थितियों से लड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

 

भूलते हो जब राह तुम

घेर लेते हैं जब सारे अवगुण

तब जो चोट कर होश में लाती है

वो मार्गदर्शिका छड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा गयीं…

मैं नहीं खोई, खोया है तुमने वजूद

इंसान बनो इंसानियत हो तुममें मौज़ूद

फिर धरा पर ही स्वर्ग होगा

प्रभु-प्रदत्त नेमतों में, सबसे बड़ी हूँ मैं !

अटल खड़ी हूँ मैं !

 

( साभार: अनुपमा पाठक द्वारा लिखित कविता ‘इंसानियत का आत्मकथ्य’)

-Mradul tripathi

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