मैं पग दो पग जब चलता था….

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मैं पग दो पग जब चलता था , अपनो से रोजाना मिलता था !
अब लंबी सैर में जाता हूँ , अपनो को सोता पाता हूँ !!
बढ़ा जब से माया का जंजाल, हम हुए अपनो से कंगाल !
फिर भी होता यही गुमान, लंबी गाड़ी और बड़ा मकान!!
मैं पग दो पग जब चलता था………

दिल की बात न कोई सुनता है, हर रोज प्रवचन मिलता है!
दिल को यही समझाता हूँ , मैं अकेला नही जो ये कथा सुनाता हूँ !!
मैं चला था अपनों से यह वादा करके, आऊंगा फिर इस छत के नीचे!
अब वही छत हमे धिक्कारती है, अपनों में अकेला पाती है!!
मैं पग दो पग जब चलता था…..

बच्चे भी अब नसीहत देते है, दादा दादी को रोते है!
मन ही मन मैं रोता हूँ अपनो को सोंचकर मैं सोता हूँ !!
टूट गयी जब जीवन की आस , किसे बताऊ ये सारा फसाद!
भूंख नही ये पेट की थी, ये तो मेरी तृष्णा थी!!
मैं पग दो पग जब चलता था……

अब पछतावा करता हूँ , अपनो से नही लड़ता हूँ !
सबका दर्द समझता हूँ , दर्द अपना छुपाकर रखता हूँ !!
अब फक्र से मैं पग दो पग ही चलता हूँ , अपनो से रोजाना मिलता हूँ !!…….

(साभार: पंडित योगेश गौतम द्वारा लिखित कविता ‘ जीवन का सफर’)

-Mradul tripathi

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