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रंगमंच पर सभी जमूरे, आह! ज़िन्दगी बनी नटी.

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रंगमंच पर सभी जमूरे,
आह! ज़िन्दगी बनी नटी.

बाखर-बाखर ईंटें उखड़ीं,
एक मकां दो मकीं हुये।
तर्पण करने गया चल दिये,
अम्मा के दुख किसे छुये।

वही पूत है जिसके खातिर,
अकुलायी दिन-रैन खटी.

सर्दी की एक अँधेरी रात की बात है

अंतड़ियों का प्रणय निवेदन,
ढीठ भूख अनसुनी करे।
भूखी सोयी भूखी जागी,
भूखों मरे न भूख मरे।

क्षुधा सघन सम सुरसा है,
रट रोटी की सघन रटी.

खेत रहन पर हुरिया का है,
संतो का क्यों फटा दुकूल।
शोषण शक्ति का है जारी,
गिद्ध दृष्टि अवसर अनुकूल।

लाला झाऊलाल को खाने-पीने की कमी नहीं थी

पाँव भारी हुये पीर के,
गति श्वासों की तीव्र घटी.

दीनों को हक़ नहीं निवाला,
धनिक और भी हुये धनी।
ता-ता थैया नाच नचाये,
नीति डोर बेशर्म तनी।

सत्ता ओवरवेट हुयी है,
दीन पेट से पीठ सटी.

उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा गयीं…

(अनामिका सिंह ‘अना’ द्वारा लिखित कविता “आह! ज़िन्दगी बनी नटी”)

 

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