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इक परी के साथ मौजों पर…

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डॉ. बशीर बद्र (Bashir Badr) उर्दू शायरी का वह जाना माना नाम है जिसने कामयाबी की बुलन्दियों को फतेह किया। बशीर बद्र की शायरी ने बहुत गहराई तक लोगों की दिलों की धड़कनों को छुआ और उन्हें अपनी शायरी में उतारा है। सन 1999 में उन्हें पद्मश्री पुरूस्कार से नवाजा गया। यह पुरूस्कार उनके साहित्य और नाटक आकेदमी में दिए गए योगदान के लिए दिया गया। 84 साल के हो चुके यह उर्दू के महान शायर दो दर्जन से भी ज्यादा मुल्कों में मुशायरे कर चुके हैं। आम लोगों की जिंदगी को बेहद ही ख़ूबसूरती और सलीके से अपनी ग़ज़लों में पिरोना इनकी सबसे उम्दा खासियत है। आज हम आपके लिए लाए हैं उनकी एक बेहद ही उम्दा ग़ज़ल।

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इक परी के साथ मौजों पर टहलता रात को
अब भी ये क़ुदरत कहाँ है आदमी की ज़ात को,

जिन का सारा जिस्म होता है हमारी ही तरह
फूल कुछ ऐसे भी खिलते हैं हमेशा रात को,

एक इक कर के सभी कपड़े बदन से गिर चुके
सुब्ह फिर हम ये कफ़न पहनाएँगे जज़्बात को,

पीछे पीछे रात थी तारों का इक लश्कर लिए
रेल की पटरी पे सूरज चल रहा था रात को,

आब ओ ख़ाक ओ बाद में भी लहर वो आ जाए है
सुर्ख़ कर देती है दम भर में जो पीली धात को,

सुब्ह बिस्तर बंद है जिस में लिपट जाते हैं हम
इक सफ़र के बा’द फिर खुलते हैं आधी रात को,

सर पे सूरज के हमारे प्यार का साया रहे
मामता का जिस्म माँगे ज़िंदगी की बात को….

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