पुकार रहा ये मन, तुझे हे कृष्णा!

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यशोमती मैया का नंदलाला

तू आया था शेषनाग की छत्रछाया में,

यमुना को पार कर हमें ये बतलाने,

कि झुको न तुम किसी भी विपदा के आगे|

अब भटक रहा ये मन, हे कृष्णा!

पुकार रहा ये मन तुझे, हे कृष्णा!

अब कौन मैया को सताए?

कौन गोपियों संग रास रचाए?

ठुमक-ठुमक कौन गैया चराए?

अब तो मॉम की गोद में बैठ,

मोबाइल और वीडियो गेम पे अंगुलियां नचाए|

अब भटक रहा ऐ मन, हे कृष्णा!

कौन अब माखन मिसरी चुराए?

कौन अब झूले पेड़ की शाखा पे,

खो गई वो तेरी बंसी की धुन|

अब तो कुकीज़ और पास्ता से ही पेट भर जाता है,

और सरकारी पार्क की संकरी गलियों में खेल हो जाता है|

अब भटक रहा ऐ मन, हे कृष्णा!

पुकार रहा ये मन तुझे, हे कृष्णा!

कैसी ये महाभारत है, समझ न आता|

राजनीति है या कूटनीति, ये भी समझ न आता|

कौन सा खेल है चौसर का हाय,

जहां आम आदमी ही हर बार दांव पर लग जाता|

गीता का वह पाठ तुझे फिर से पढ़ाना ही होगा|

अर्जुन की अंगुली थाम पथ प्रदर्शक बनना ही होगा|

अब भटक रहा ऐ मन, हे कृष्णा!

पुकार रहा ये मन तुझे हे कृष्णा!

लांघ दी सारी सीमाओं को

इन आज के दुर्योधनों और दु:शासनों ने

चीखती-पुकारती तुझे न जाने कितनी द्रोपदी अब तो सुन ले उनकी पुकार

उगा दे वैसा ही सूरज इस कलयुग में भी,

जब अर्जुन ने मार गिराया था जयद्रथ को|

अब भटक रहा ऐ मन, हे कृष्णा!

पुकार रहा ये मन, तुझे हे कृष्णा!

-बकुल गुप्ता

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