साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति

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हिंदी साहित्य जगत के लिए एक बड़ी दुःख की खबर है| साहित्य जगत को अपूरणीय क्षति हुई है| हिंदी के विख्यात आलोचक, साहित्यकार  और आलोचना विधा के पुरोधा नामवर सिंह (Namvar Singh) का मंगलवार की रात 11.51 बजे निधन हो गया| वे 93 वर्ष के थे|   

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गौरतलब है कि नामवर सिंह (Namvar Singh) पिछले कुछ दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे| जनवरी में वे अचानक अपने रूम में गिर गए थे| इसके बाद उन्हें उपचार के लिए दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) ले जाया गया था| यहीं उनका इलाज चल रहा था|

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नामवर सिंह (Namvar Singh) का जन्म बनारस के जीयनपुर गांव में हुआ था| उन्होंने हिन्दी साहित्य में एमए व पीएचडी करने के पश्चात् काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अध्यापन किया, लेकिन 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रूप में चुनाव लड़ने तथा असफल होने के बाद उन्हें बीएचयू छोड़ना पड़ा। इसके पश्चात उन्होंने सागर विश्वविद्यालय और जोधपुर विश्वविद्यालय और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक के रूप में सेवाएं दी। हिन्दी के साथ ही वे अंग्रेज़ी, उर्दू, बांग्ला एवं संस्कृत भाषा में भी निष्णात थे।

हिंदी में आलोचना विधा को नामवर सिंह (Namvar Singh) ने नई पहचान दी| इस योगदान के लिए उन्हें सदैव याद किया जाएगा| हिंदी आलोचकों में भी ऐसी लोकप्रियता किसी को नहीं मिली जैसी नामवरजी को मिली है|

Shri Rajnath Singh at a seminar on noted Hindi writer Namvar Singh at Indira Gandhi National Centre for Arts, Near India Gate on July 28, 2016

दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में आयोजित ‘नामवर संग बैठकी’ कार्यक्रम में लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी ने उन्हें ‘अज्ञेय’ के बाद हिंदी का सबसे बड़ा ‘स्टेट्समैन’ कहा था| इसी बात से नामवर सिंह (Namvar Singh) की शख़्सियत का अंदाज़ा लगाया जा सकता है|

उन्हें (Namvar Singh) साहित्य अकादमी पुरस्कार (1971), हिंदी अकादमी, दिल्ली की ओर से शलाका सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से ‘साहित्य भूषण सम्मान’, ‘पाखी’ तथा इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी की ओर से शब्दसाधक शिखर सम्मान (2010) और महावीरप्रसाद द्विवेदी सम्मान (2010) से सम्मानित किया जा चुका है|

उनकी कई कृतियां प्रकाशित हो चुकी है, वहीं उन पर भी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं|  ‘बक़लम ख़ुद’ में उनकी उपलब्ध कविताओं एवं अन्य विधाओं की गद्य रचनाएं संकलित हैं। ‘हिन्दी के विकास में अपभ्रंश का योग’ उनकी शोध-कृति रही है, जिसका संशोधित संस्करण अब ‘पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य’ नाम से उपलब्ध है। नामवर सिंह की आलोचनात्मक कृतियों में आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ, छायावाद, इतिहास और आलोचना, कहानी : नयी कहानी, कविता के नये प्रतिमान, दूसरी परम्परा की खोज, वाद विवाद और संवाद, साक्षात्कार, कहना न होगा, बात बात में बात, पत्र-संग्रह, काशी के नाम आदि प्रमुख हैं। इनके अलावा आलोचक के मुख से, कविता की ज़मीन और ज़मीन की कविता, हिन्दी का गद्य पर्व, प्रेमचन्द और भारतीय समाज, ज़माने से दो-दो हाथ, साहित्य की पहचान, आलोचना और विचारधारा, सम्मुख, साथ साथ, पुरानी राजस्थानी, चिन्तामणि आदि उल्लेखनीय हैं।

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साहित्य जगत में उन्होंने जो स्थान हासिल किया है, वह स्थान बिरले ही हासिल कर पाते हैं| उनकी कमी को पूरी करना नामुमकिन है| उनके निधन पर टैलेंटेड इंडिया की ओर से उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि|

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-अंकुर उपाध्याय

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