जिसकी सरकार, उससे दरकार

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आपने संगीत के दादरा, झपताल, एकताल, त्रिताल आदि तालों के बारे में तो सुन ही रखा होगा परंतु इन दिनों हर तरफ एक नई ताल बज रही है| इस ताल का नाम है हड़ताल| जिधर देखो, उधर सभी अपनी मांगों को मनवाने के लिए हड़ताल कर रहे हैं|

प्राचीनकाल में भगवान् से इच्छित वर पाने के लिए लोग कड़ी तपस्या करते थे| अपने तपोबल से वे भगवान् को प्रसन्न कर अपनी मनोकामना पूरी करवाते थे| वर्तमान समय में नेताओं के हाथों में शक्ति है| जिसके पास सरकार होगी, उसी से जनता को दरकार होगी| लोग सोचते हैं हड़ताल रूपी तपस्या से सरकार उनकी बात सुनेगी| आम दिनों में यह इतनी असरकारक नहीं होती है, जितनी चुनाव के समय में क्योंकि सत्तापक्ष अधिक से अधिक वोट बटोरने के लिए जनता की मांगों को मान लेता है| इस समय विपक्ष भी हड़ताल करने वालों के साथ इस तरह खड़ा रहता है, जैसे जनता के सुख-दुःख की सर्वाधिक चिंता उसे ही है|

जिस तरह शीत, ग्रीष्म और वर्षा का मौसम होता है| उसी तरह हड़ताल का भी एक मौसम होता है| जिस वर्ष चुनाव नज़दीक होते हैं, उस समय सर्वाधिक हड़तालों का आयोजन होता है| मध्यप्रदेश में भी 2018 के अंत में चुनाव है, इस कारण इस समय मानो हड़तालों की बाढ़ सी आ गई है| जिधर देखो लोग हड़ताल करते नज़र आ रहे हैं| बस संचालक यात्री किराये में 10 प्रतिशत बढ़ोतरी करने को लेकर हड़ताल पर उतरे तो वहीं अपनी मांगों को लेकर ग्रामीण डाकसेवक भी मैदान में आ गए| वनरक्षकों और हम्मालों ने सोचा कि जब हड़तालों का दौर चल ही रहा है तो वे क्यों पीछे रहें| जूनियर डॉक्टर भी इस मौके को चूकना नहीं चाहते थे, इसलिए उन्होंने भी बहती गंगा में हाथ धो ही लिए|

बैंकों में भी दो दिवसीय (30 और 31 मई) हड़ताल की गई| बैंक एम्प्लाई वेतन में केवल 2 फीसदी की मामूली बढ़ोतरी की पेशकश से खुश नहीं थे, इस कारण उन्होंने हड़ताल कर अपनी मांगों को मनवाने की पुरजोर कोशिश की| जब सब हड़ताल कर ही रहे हैं तो अन्नदाता क्यों पीछे रहे उन्होंने भी आज से आंदोलन की शुरुआत कर दी है| सब्जियों के उचित दाम नहीं मिल पाने के कारण उन्होंने फैसला लिया है कि वे शहरों में दूध और सब्जियों की आपूर्ति नहीं करेंगे| इस चुनावी साल में वे राजनीतिक दलों के बहकावे में आकर आंदोलन कर सरकार से अपनी मांगें पूरी करवाना चाहते हैं|

चार साल सरकार अपनी मनमर्जी चलाती है, परंतु जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं, सत्तापक्ष को अपनी सरकार को बरकरार रखने के लिए हड़तालकर्मियों की मांगें मानने पर मजबूर होना पड़ता है क्योंकि यदि अधिक से अधिक वोट चाहिए तो जनता को तो खुश करना ही होगा अन्यथा जनता पटखनी दे देगी|

-अंकुर उपाध्याय      

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