संसद में हंगामा तो बनता है…

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संसद का मानसून सत्र शुरू होने से पहले यह फिक्र की गई कि यह सत्र भी हंगामे की भेंट न चढ़े| सदन की ओर से स्वयं सुमित्रा महाजन ने इस सत्र को सफल बनाने और समय के सदुपयोग करने की गुजारिश की| वहीं पक्ष और विपक्ष भी एकजुट होकर इसे सफल बनाने का वादा करने लगे| अब सवाल यह है कि आखिर जो आज तक नहीं हुआ, उसकी ज़रूरत अचानक क्यों पड़ी? 

हंगामा, कुर्सी-मेजों को पीटना, सदन की कार्यवाही दोपहर तक और फिर दिनभर के लिए स्थगित किया जाना हमारी गौरवमयी सियासी परंपरा का हिस्सा है, जिसे हम कभी नहीं छोड़ सकते| बिना हंगामे की भारतीय संसद के बारे में सुनकर ही अजीब लगता है| अटके हुए चालीस बिल और उनमें से छह जरा से महत्वपूर्ण फिर कभी पास हो ही जाएंगे, लेकिन हंगामे का सिलसिला टूटना नहीं चाहिए| अरे लगता कितना है, महज ढाई लाख रुपए प्रति मिनट का खर्च ही तो है| ऐसे में देश के सियासतदारों के मेज कूटने पर एक दिन में 12 करोड़ रुपए खर्च करना तो बनता है|

आखिर ये ही वे लोग हैं, जो देश में सालभर या अगले सत्र तक पूरी शिद्दत से देश में फालतू के मुद्दों पर सियासत करते हैं और जब मुद्दे न हो तो मुद्दे पैदा कर लेते हैं, जो अपने आप में ही एक कला है| ऐसे में हंगामा ज़रूरी है, ऐसे मौके बार-बार नहीं आते और फिर हंगामा नहीं होगा तो नेताओं को पूछेगा भी कौन? उनकी असलियत का क्या, जो ऐसे ही मौके पर जनता के सामने आती है| सदन में हंगामे को लेकर फिक्रमंद होने के बजाय नेताओं को हंगामे के नए-नए तरीके ईज़ाद करने चाहिए, जो आज कल ट्रेंड में हैं| जमाना ट्रेंड का है और जो खुद को अपडेट रखेगा वही सुर्खियों में बना रहेगा| सदन की कार्यवाही का क्या वो तो होती रहेगी, लेकिन हंगामा भी तो सदन की कार्यवाही का ही हिस्सा है| उसे इस तरह से बेज़ार करना न्याय नहीं होगा|

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