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कटाक्ष: श्रद्धांजलि का श्रद्धा से ताल्लुक है क्या ?

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The tribute given by Prime Minister Narendra Modi on the death anniversary of Rajiv Gandhi -राजीव गांधी की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दी श्रद्धांजलि | पढ़ कर जेहन में वही सवाल कौंध गया, जो फ़िलहाल आप सोच रहे है| हाल ही में जिन राजीव को महज चुनाव प्रचार के हथकंडे के रूप में मोदी भ्रष्ट नंबर वन बताने से भी नहीं चूके थे, उनकी पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रद्धांजलि का श्रद्धा से कितना ताल्लुक रहा होगा, ज्यादा सोचने की बात नहीं है|

वैसे भी गांधी परिवार के प्रति मोदी की श्रद्धा किसी से छुपी नहीं है| फ़िलहाल मोदी एग्जिट पोल और चुनाव चर्चा से दूर एक कीमती आलीशान और विलासिता के तमाम तामझाम वाली एक गुफा में कैमरे की मौजूदगी में ध्यान-व्यान लगा रहे हैं| गुफा को बनाने में आया खर्च लाखों में बताया गया है| यदि ऐसी कोई कंदरा हमारे ऋषि-मुनियों को मिल जाती तो सोचिये उनका तपोबल कहां पहुंच जाता? इस बात की कल्पना हम तो नहीं कर सकते |

चुनाव से आगे अब क्या ?

बहरहाल कलयुग में लौटते हैं| बात गांधी परिवार और पीएम मोदी की हो रही थी| हाल ही में बीजेपी का दामन थामने वाली मप्र की भोपाल सीट से लोकसभा चुनाव लड़ रही साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को देशभक्त कहा था | मोदी फिर तैश में आए और गांधी जी के प्रति अपनी श्रद्धा साबित करने के चलते साध्वी के अपराध को अक्षम्य कहते हुए उन्हें दिल से कभी माफ़ न करने की बात कह गए|

पीएम वक्त की नज़ाकत को बखूबी समझते हैं| हालाँकि साध्वी पर एक्शन क्या हुआ यह बात आई-गई हो गई है| वैसे भी पिछले पांच साल में मोदी लगभग हर मंच से गांधी जी का जिक्र कर खुद को राष्ट्रभक्त और बीजेपी को राष्ट्रवादी पार्टी बता चुके हैं, लेकिन सवाल यह है कि ज्यादातर मौकों पर पीएम की दोहरी नीति पकड़ ली जाती है| यह और बात है कि उसे सुर्खियां बनने से कौन रोक लेता है यह कोई नहीं जानता? या शायद सब जानते हैं !

मूर्तियों की आत्माएं सोच रही होगी?

इसके उलट यदि विपक्ष के किसी नेता की टांग खींचनी होती तो बीजेपी की फौज, जिसमे केंद्रीय मंत्री से लेकर पार्षद और बूथ लेवल का कार्यकर्ता तक शामिल होता और एक स्वर में मुद्दे पर कड़ी निंदा वाली प्रतिक्रिया देता | वैसे सरकार कुछ भी कर सकती है, सरकार है ! पिछले पांच सालों में सिर्फ उन सवालों के जवाब दिए गए हैं, जो सरकार को माकूल लगे बाकी सवाल बड़ी सफाई से दफ़न किए गए, लेकिन राजीव और महात्मा गांधी के किरदार को ज़रूरत के हिसाब से बदल लेना पीएम मोदी की साख में बट्टा नहीं है? बहरहाल, सोशल मीडिया के युग में ‘नमो अगेन’ बात की गहराई को कितना समझेंगे पता नहीं …….

व्यंग्य: मीडिया की उम्मीदें टूटी, मुंह से एक बात न फूटी

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