उन्होंने अपने खेत पर अंगद का मंदिर बनाया हुआ था

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उन्होंने अपने खेत पर अंगद का मंदिर बनाया हुआ था। ये पूरे संसार में एक मात्र मंदिर था जिसमें अंगद की पूजा होती थी।

इसका कारण था, बचपन में देखी गई रामलीला में अंगद ने प्रभु श्रीराम का नाम लेके रावण की सभा में जो पैर जमाया था, और चुनौती दी कि कोई भी मेरा पैर अगर तिल भर भी हिला देगा तो प्रभु श्रीराम हार मान कर वापस लौट जाएँगे। गाँव के सबसे बड़े पहलवान कुंदन काका जो रावण का रोल करते थे, वे भी अंगद बने हुए किस्सु कबाड़ी का पैर नहीं हिला पाए थे।

इस बात ने विश्वपाद के बालमन को बेहद प्रभावित किया और वे अंगद की शक्ति के लपेटे में आ गए थे, उन्होंने छुटपन में ही गाँव के अखाड़े में जाकर अपने को तैयार करना शुरू कर दिया था। उनके दादाजी का नाम विश्वमोहन, पिता का नाम विश्वस्वरूप, चाचा का विश्वगोपाल, छोटे चाचा का विश्वविजय था- इस नाते सम्पूर्ण विश्व पर उनके गुधौलिया परिवार का एकछत्र राज था। विश्व में कुछ और बचा नहीं था तो पूरे परिवार ने आम सहमति से अपनी अगली पीढ़ी के इस प्रथम चिराग़ का नाम विश्वपाद रख दिया था, जिसका अर्थ होता है- विश्व के चरण या ऐसे चरण जिनकी विश्व भर में प्रतिष्ठा है।

इन्दुमती अपने बूढ़े पिता के साथ विन्ध्याचल के घने जंगल में रहती थी

इनके नाम ‘विश्वपाद’ ने भी अंगद के प्रति इनकी भक्ति को बढ़ाने में फ़र्टीलाइज़र का काम किया, इनको लगता की दुनिया के इतने लम्बे इतिहास में अभी तक मात्र तीन चरण हैं जिनकी चर्चा होती है..

 

एक- रावण का विभीषण पर पद प्रहार।

दूसरा- अंगद का रावण की सभा में पद स्तम्भन ( चरण जमा देना )

तीसरा- नील आर्म्स्ट्रॉंग जिसने चाँद पर सबसे पहले अपने चरण रखे थे।

वैसे ही इनको भी अपने पदों ( चरणों ) को विश्व के चौथे चरण के रूप में प्रतिष्ठित करना आवश्यक है, तभी वे अपने नाम विश्वपाद की गरीमा को सुरक्षित रख पाएँगे।

सो वे अपने आराध्य देव अंगद से प्रेरित होकर प्रतिदिन अखाड़े में अपने पैरों को यथा नाम तथा गुण देने में जुट गए।

किंतु जैसी की परम्परा होती है, ग्रामीण अंचल में शास्त्रीयता को लोग सरल करके स्वीकारने में विश्वास करते हैं तो वही इनके शास्त्रीय गरीमा से पूर्ण नाम विश्वपाद के साथ हुआ। लोग इन्हें विश्वपाद की जगह सुविधानुसार- विश्पाद या बिस्पाद कहके बुलाने लगे।

माना जाता है की नाम का प्रभाव मनुष्य की प्रकृति पर पड़ता है, यह सत्य है या नहीं यह विवादास्पद है, किंतु बिस्पाद के ऊपर ये फ़ॉर्म्युला एकदम सही साबित हुआ। पहलवानी के चक्कर में ताक़त बढ़ाने के लिए अपनी पाचन शक्ति की औक़ात से ज़्यादा क़िस्म-क़िस्म के पिस्ता, बादाम, अखरोट, दूध, दही, केला, छाँस, लस्सी के निरंतर सेवन से उनके पेट का सिस्टम गड़बड़ा गया जिस के परिणामस्वरूप हर दस पंद्रह मिनिट में विश्पाद के शरीर से ऑटोमेटिक गैस रिसती रहती, इनके पेट से बिना आवाज़ किए छूटने वाली इस “अपानवायु” में विलक्षण मारक क्षमता थी। यह मरे हुए चूहे, सड़े हुए अंडे, या किसी बड़े शहर के कभी ना साफ़ होने वाले गंधाते हुए नाले की दुर्गन्ध से भी अधिक भीषण और अत्याचारी थी। जब विश्वपाद अपनी ताल ठोक कर अखाड़े में उतरते तब उनका यह वायवास्त्र अखाड़े में इनसे गुँथे हुए पहलवान के लिए प्राण घातक होता था, जिससे विचलित होकर विरोधी पहलवान दम घुट के मरने से बेहतर, चित्त होकर हारना पसंद करता। अपनी प्रतिष्ठा से अधिक उसे अपने प्राणों परवाह हो जाती। उस समय यदि विश्पाद उसकी पकड़ में भी होते, वो उनको चित्त करके जीतने की कगार पर होता और तब विश्वपाद हार से बचने के लिए उसकी पकड़ से छूटने के प्रयास में अपने शरीर को आड़ा तिरछा करते, ठीक उसी समय उनका यह “वायुअस्त्र” जो ख़ुद मुख़्तार की श्रेणी में आता था, जिसपर इनका कोई कंट्रोल नहीं था, बिना इनकी मर्ज़ी के चुपचाप छूट कर विश्पाद के लिए संकटमोचक का काम करता। विष से भी अधिक घातक वायु के चेंबर के बिलकुल समीप होने कारण वह विरोधी पहलवान जो अभी तक इनपर हावी था इनको छोड़ने के लिए फड़फड़ाने लगता, लेकिन बिस्पाद जोंक के जैसे उससे चिपक जाते जिससे अपनी जान बचाने के लिए वो विरोधी पहलवान स्वयं ही चित्त हो जाता, अपनी पीठ पर मिट्टी लगा लेता और ख़ुद ही विश्वपाद की जीत कि घोषणा करते हुए अखाड़े के बाहर भाग खड़ा होता।

लोग आश्चर्य से विश्वपाद के इस कौशल की दाद देते, कुश्ती के बड़े बड़े महारथियों को भी विश्वपाद का ये अनोखा दाँव समझ में ना आता, वे चमत्कृत हो जाते की पता नहीं ये कौनसी विद्या है बिस्पाद के पास ? जो अभी तक बिस्पाद की छाती पर चढ़ा हुआ पहलवान ख़ुद ही उनको अपने ऊपर लेके चित्त हो जाता है और अखाड़े से भाग खड़ा होता है ?

इस “हवाबाण दाँव” के कारण पहलवानी की दुनिया में उनका नाम बन गया, वे अजेय पहलवान हो गए थे। लोग उनसे जोड़ लिखाने से डरते परिणामस्वरूप कभी-कभी वे बिना लड़े ही विजेता घोषित कर दिए जाते।

कुश्ती फ़ेडरेशन में इस बात की शिकायत भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि उनका ये पाद-प्रहार जिसका प्रमाण पेश कर पाना असम्भव था, कुश्ती के नियमों के मुताबिक़ ये अवैध, अनैतिक, धोखा या छल की श्रेणी में नहीं आता था, क्योंकि हवा कोई पुख़्ता सबूत नहीं होता। और सबसे बड़ी बात इस पादप्रहार का उस हारे हुए पहलवान के अलावा कोई और गवाह भी नहीं होता था, क्योंकि मामला पूरा साउंड्लेस था। शिकायत करने पर इसे पहलवान के द्वेष, उसकी चिढ़ की श्रेणी में रखा जाता जो अपनी हार से बौखला कर बिस्पाद के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप कर रहा है। रेफ़री भी बदबू सूंघता था किंतु इसका लाभ बिस्पाद को ही मिलता, वो कहता की बिस्पाद ने अपने “उठा पटक दऊँ-तरै गुलक दऊँ” दाँव से अपने विरोधी पहलवान को पदा कर रख दिया।

उन दिनों पहलवानी में सुहागपुर, इटारसी, बनारस, जबलपुर, बुरहानपुर एक बड़ा नाम हुआ करता था। यहाँ के पहलवानों से जोड़ लिखाते हुए अन्य मल्लों के पैर कांपते थे। विश्पाद के कारण हमारे गाँव के अखाड़े की भी कुश्ती की दुनिया में धाक सी जम गयी थी, इसलिए दूर-दूर के प्रसिद्ध मल्ल भी हमारे गाँव में ताल ठोकने के लिए बेताब रहते थे। इन पहलवानों को जिनके लंगोट को आजतक कोई अन्य पहलवान हाथ भी नहीं लगा पाया था, विश्पाद के इस दम घोंटूँ हुनर का इल्म ही नहीं था। सो वे अति उत्साह से नागपंचमी, दिवाली, दशहरा पर हमारे यहाँ होने वाले “बड़े दंगल” में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते और बिस्पाद को चित्त करने की हसरत लिए उनके ख़िलाफ़ जोड़ लिखवा लेते। किंतु इनमें से हर एक का वही हश्र होता, बिस्पाद से लिपटते ही ये बाहुबली जल बिन मछली के जैसे फड़फड़ाने लगते।

मनुष्य बिना भोजन के तीस दिन ज़िंदा रह सकता है किंतु बिना साँस लिए तीन मिनिट में उसके प्राण निकल सकते हैं। साँस को रोकना व साँस का अवरुद्ध हो जाना दो अलग बातें होती हैं। बिस्पाद से लड़ी जाने वाली कुश्ती साँस रोकने की यौगिक क्रिया के अंतर्गत नहीं बल्कि साँस के बलात अवरूद्ध किए जाने की श्रेणी में आती थी। बिस्पाद के दमघोंटू आलिंगन में फँसे हुए ये वीर-बलिष्ठ-बाहुबली-भीम पुरुष, उस समय संसार के सबसे निरीह और असहाय प्राणी प्रतीत होते। अभी तक अजेय रहने वाले ये मल्ल हमारे गाँव की हवा से परास्त हो जाते और उन्हें मजबूरन सन्यास लेना पड़ता।

कुश्ती साँस रोक कर लड़ी जाने वाली विधा नहीं है, फिर भी कुछ पहलवानों ने विश्पाद के इस दाँव का तोड़ निकालने के लिए, उनको चित्त करने हसरत से कबड्डी का प्रशिक्षण लिया जिससे वे दो मिनिट तक साँस रोक के लड़ सकें। किंतु गैस रिलीज़ का कोई निश्चित टाइम तो होता नहीं था, जिससे विश्पाद का विरोधी टाइम सेट करके साँस रोक सके ? अपानवायु के अप्रत्याशित रिसाव से पहलवान हदबदा जाते जिससे कभी कभी उन्हें ठसका भी लग जाता और उनकी दम टूट जाती क्योंकि विश्पाद का ये हवाबाण एच टू एस ओ फ़ोर से भी अधिक घातक होता था।

विश्वपाद पहलवानी में तो बढ़ रहे थे किंतु पढ़ाई में पिछड़ रहे थे। ऐसा नहीं था की वे ठस्स बुद्धि थे, वे निम्न औसत बुद्धि के विद्यार्थी थे किंतु गैस के अभिशाप के कारण क्लास रूम उनको रिष्यमूक पर्वत के जैसा लगता था जहाँ पर अंगद के पिता वानरराज बाली क्षमता होने के बाद भी जान के भय से नहीं जाते थे। क्योंकि उन्होंने ददुंभी को मार के एक योजन दूर फेंक दिया था, जिससे ददुंभी के रक्त की बूँदें ऋषियों के हवन कुंड में गिर गयीं थी, ऋषियों ने बाली को शाप दिया की ख़बरदार अगर रिष्यमूक पर्वत पर आया तो जान से हाथ धो बैठगा।

विश्वपाद को क्लास रूम में जान का नहीं अपने मान का ख़तरा था, क्योंकि जिस “ठुसकी की ठसक” ने उन्हें अजेय पहलवान बना दिया था वही उनकी कुख्याति का कारण बन जाती और तमाम बाहुबल होने के बाद भी उन्हें अपने “ऋषि रूपी क्लास्मेट्स” की हिक़ारत और धिक्कार से उपजे “रौरव नरक” की यातना से गुज़रना पड़ता। इसलिए वे स्कूल को रिष्यमूक पर्वत मान कर उससे दूर दूर ही रहते। जिससे गुधौलिया परिवार चिंता में पड़ा रहता। जैसे तैसे बिस्पाद स्कूल से पास होकर कॉलेज में बीए के मार्ग से होते हुए एल॰एल॰बी॰ हो गए।

पहलवानी और पढ़ाई की इस प्रक्रिया के बीच गुपचुप उन्होंने डाक्टर्स से इस “निराकार बेआवाज़ मानभंजनी” का उपचार कराना चाहा था, किंतु परीक्षण के दौरान ही उसके रिसाव से डॉक्टर बेहाल हो कमरा छोड़कर भाग जाते और आइन्दा यहाँ ना आने की चेतावनी देकर उन्हें भगा देते। एक-एक कर इलाक़े भर के सभी डॉक्टरों ने उनके लिए अपने दवाखाने के दरवाज़े बंद कर दिए।

डॉक्टरों के रवैए से नाख़ुश होकर उन्होंने एलोपेथी छोड़, “जड़ी बूटी वालों” को पकड़ लिया जिससे उनकी समस्या ख़त्म होने की जगह और बिफर गई। अभी तक वे दस बाई दस के एरीआ को ही कवर करते थे, किंतु जड़ी बूटियों के सेवन से उसका घनत्व और अधिक बढ़ गया अब वे बीस बाई बीस के ओपन-क्लोज़ एरीआ को प्रभावित करने लगे। अपनी ही हवा को अपने ही विरुद्ध वातावरण बनाता देख विश्वपाद ने इसका तोड़ निकाला और भीड़-भाड़ में घुसना शुरू कर दिया। क्योंकि भीड़ में पकड़े जाने की सम्भावना ना के बराबर होती है। क्योंकि भीड़ पर किसी भी कृत्य-दुष्कृत्य की सामूहिक ज़िम्मेदारी होती है, सब एक दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं, लेकिन कोई किसी पर स्पष्ट आरोप नहीं लगा पता। इसमें कोई एक व्यक्ति अपराधी नहीं ठहराया जाता, शक की बिना पर मूल अपराधी दोषी होते हुए भी, दोष मुक्त होकर निर्दोष जीवन जीता रहता है। साथ ही उन्होंने आजीवन विवाह ना करने की प्रतिज्ञा भी कर ली। क्योंकि जिस वायु के साथ वे इतने सालों से रह रहे थे उसके कोप से वे भलीभाँति परिचित थे, कि जब इस “दुष्टा” ने इतने बड़े बड़े पहलवानों को उनके साथ नहीं टिकने दिया तो फिर उस बेचारी मासूम लड़की की क्या बिसात ? शादी की पहली रात ही ये “प्रतिष्ठाखोर फुस्की” बिना कोई शोर शराबे के अपने प्रकोप से उस मासूम लड़की को थू-थू करते हुए घर से भागने पर मजबूर कर देगी, उस नवयौवना को थूँकता देख पूरा समाज उन पर थू-थू करेगा, भद्द पिटेगी सो अलग, इसलिए बदनामी से बेहतर है ब्रह्मचर्य। सो वे ब्रह्मचारी हो गए।

ओ मस्तक विराट, अभी नहीं मुकुट और अलंकार

उनके ब्रह्मचर्य की घोषणा से घर में हड़कंप मच गया। क्योंकि गुधौलिया वंश को आगे बढ़ाने की ज़िम्मेदारी उनके मज़बूत कंधों पर थी, वे मात्र अपराजित पहलवान ही नहीं एक सफल वक़ील की ख्याति को भी प्राप्त कर चुके थे। प्रदेश ही नहीं देश भर की अन्य अदालतों में भी लोग उनको जमानतवीर के नाम से जानते थे। कितना ही संगीन अपराध क्यों ना हो, अपराधी को कहीं भी ज़मानत ना मिल रही हो, वो चारों तरफ़ से निराश हो चुका हो- तब वो बिस्पाद के पास आता और विश्वपाद उसको ज़मानत दिलवाकर ही दम लेते। वे सेशन कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक उन जजों की बेंच पर अपना केस पुट करते जिनकी अदालत खचाखच भरी होती थी। उनके घुसते ही अदालतों का विषाद पूर्ण वातावरण विषाक्त हो जाता। अक्सर जजों के सामने वक़ील बेचैन होते हैं लेकिन विश्वपाद की उपस्थिति में जज बेचैनी से फड़फड़ाने लगते, उन्हें वॉमिटिंग सेन्सेशन जैसा होने लगता, स्टैनो से लेकर चोबदार तक ना चाहते हुए भी अदालत की अवमानना कर बैठते, वे अपना काम बीच में छोड़ अपनी जगह से उठ खड़े होते, अदालत की गम्भीरता को ताक पे रख नाक पर रूमाल रख लेते, या नाक के सामने दोनों हाथ ज़ोर ज़ोर से लहराते हुए पंखा झालने लगते, जिससे उनपर कभी-कभी कंटेम्प्ट भी लग जाता। कुछ कच्चे दिल वाले जिन्हें अमोनिया टाइप की गंध, मरे चूहे की बदबू से एलर्जी होती वे अचानक अदालत में उलटी कर देते।

एक और आश्चर्य जो देखने को मिलता वो ये की अदालत के कमरे में जज के आने पर पूरी अदालत के खड़े हो जाने की परम्परा है, किंतु विश्वपाद के कमरे में घुसते ही जज साहब यकायक अपनी कुर्सी से खड़े हो जाते, उनकी शक्ल देख के लगता की जैसे उन्हें ख़ुद भी नहीं पता की वे किस अदृश्य शक्ति के कारण ना चाहते हुए भी यंत्रचलित से उठ खड़े हुए, ऐसा वे कोई एक बार नहीं, जब तक विश्वपाद उनसे ज़मानत के लिए जिरह करते रहते तब तक बार बार वे कुर्सी से खड़े हो जाते, फिर बैठ जाते, फिर खड़े हो जाते, फिर बैठ जाते, ऐसा लगता की वे कोर्ट से भाग जाना चाहते हैं लेकिन कहीं ख़ुद पर कंटेम्प्ट ना लगाना पड़ जाए इसलिए बैठ जाते।

विश्वपाद द्वारा उत्सर्जित वह “निहशब्द बदबू बम”- भगवान की लाठी के जैसा था- जो दिखाई नहीं देती लेकिन व्यक्ति उसकी चोट से कराहता रहता है। व्यक्ति की भले ही कोई मर्यादा ना हो, लेकिन पद की एक मर्यादा होती है जिसकी रक्षा करना व्यक्ति का प्रमुख धर्म है, सो साहब वीरोचित भाव से उन हवाई हमलों को अपनी क्षमता भर बर्दाश्त करते।

शरीर और आत्मा एक दूसरे से बेइंतहाँ मोहब्बत करते हैं, लेकिन विश्वपाद की यह “कुलटा कुलक्षणी कुवास” शरीर को आत्मा से और आत्मा को शरीर से मुक्त हो जाने के लिए तीव्रता से प्रेरित करती, और विश्वपाद इस पूरी स्थिति से अनभिज्ञ स्थितप्रज्ञ भाव से अपने मुवक्किल को ज़मानत दिए जाने के लिए जिरह करते रहते। साहब के पास इस भीषण गैस त्रासदी से बचने का एक मात्र उपाय बचता था कि विश्वपाद की ज़मानत याचिका को तत्काल प्रभाव से मंज़ूर कर विश्वपाद को फ़ौरन अदालत से रुख़सत करना।

अदालत में हथियार ले जाना, ऊँची आवाज़ में बात करना, शोर शराबा करना ये सब अदालत की गरिमा को खंडित कर कंटेम्प्ट के दंड के अंतर्गत आता था।लेकिन विश्वपाद इनमें से किसी भी कैटेगॉरी के अंतर्गत नहीं आते थे, क्योंकि उनसे छूटने वाली असहनीय बदबू-बेआवाज़ हुआ करती थी।

क़ानून की आँख पर पट्टी बंधी होती है, वो देखकर नहीं, सुनकर न्याय करता है- और विश्वपाद का यह “ग़ैरइरादतन कृत्य” सुनने की नहीं, सूँघने की श्रेणी में आता था। वे प्रत्यक्षत: ऐसा कोई काम ही नहीं करते थे जो अदालत की अवमानना के अंतर्गत आता हो, ये अपराध नहीं रोग की श्रेणी में आ सकता था, और रोगी होना कोई अपराध नहीं होता। फिर अदालत के पास इनके इस “विवेकहन्ता रोग” का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण भी नहीं था, जिसका हवाला देकर उनका लाइसेन्स रद्द किया जा सके ?

विश्वपाद की उपस्थिति में वहाँ बैठे हुए हर व्यक्ति के दिल में यह तमन्ना पैदा होती की जैसे क़ानून की आँख पर पट्टी बंधी है, काश वैसी ही पट्टी नाक पर भी बंधी होती तो अधिक सटीक न्याय हो पता। क्योंकि गंध में विवेक को विचलित करने की अपार क्षमता होती है। गंध से ही व्यक्ति प्रभावित और अप्रभावित होता है। गंध व्यक्ति के विवेक का हरण कर लेती है इसी सिद्धांत पर दुनिया भर में इत्र का, पर्फ़्यूम का डीओडरंट का और उससे जुड़ी विज्ञापन फ़िल्मों का अरबों खरबों का व्यापार चल रहा है। भोजन की गंध ही भूख को बढ़ाने और पचाने वाले एंज़ायम्ज़ शरीर में छोड़ती है। सो क़ानून की सिर्फ़ आँख बंद करने से काम नहीं चलेगा, उसकी नाक भी बंद करनी आवश्यक है, जिससे विवेक भ्रमित ना हो। क्योंकि विवेक सुन के भले ही प्रभावित ना हो किंतु सूंघ के निश्चित ही प्रभावित होता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण विश्वपाद जैसे साधारण से वक़ील का असाधारण जमानतवीर वक़ील के रूप में प्रतिष्ठित होना है। संसार में लोगों के व्यक्तित्व की ख़ुशबू फैलती है, किंतु ऐडवोकेट विश्वपाद गुधौलिया के व्यक्तित्व की “बदबू” ने चंहुँ ओर हड़कम्प मचा दिया था।

वे दस बार शरीर के ऊर्ध्व भाग से प्राणवायु इन्हेल करते और एक बार शरीर के अधोभाग से प्राणघातक वायु का निष्क्रमण करते। पता नहीं परमात्मा की कौन सी कारीगरी के तहत उनके द्वारा इन्हेल की गई ऑक्सीजन, सल्फ़्युरिक ऐसिड ( गंधकाम्ल ) की गंध में कन्वर्ट होकर अपानवायु के रूप में निकलकर विध्वंस मचा देती ?

सभी कानूनविदों ने सलाह की- कि एक वक़ील के रूप में विश्वपाद देश की प्रत्येक अदालत का वातावरण दूषित कर रहा है, जिसे क़ानूनन हम रोक नहीं सकते। तो क्यों ना इसे एलेवेट करके जज बना दिया जाए ? जिससे इसका कार्यक्षेत्र सीमित हो जाएगा व अन्य अदालतें व न्यायाधीश विश्वपाद की उपस्थिति से होने वाले दुष्प्रभाव से बच जाएँगे। विश्वपाद को एलेवेट करके हम न्याय को प्रोटेक्ट कर लेंगे। सो विश्वपाद को उठाने के नाम पे उन्हे जज बनाकर एक जगह बिठा दिया गया।

इस महानतम उपलब्धि से पूरे गुधौलिया परिवार में हर्ष की लहर दौड़ गयी, उनके दादाजी, पिताजी से लेकर दोनों चाचा उनके ऊपर विवाह कर लेने का दबाव बनाने लगे, उनके ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा पर चोट ना आए इसलिए उनके दादाजी ने उन्हें फुसलाते हुए तर्क दिया, वे बोले प्रिय पाद, तुम्हारा यह विवाह वासना पूर्ति का नहीं वंश वृद्धि का हेतु है। पुत्र- वंश की रक्षा, वंश की वृद्धि करना तुम्हारा कर्तव्य है। क्योंकि ‘पु’ नाम के नरक से पितरों को तारने का काम पुत्र ही करता है, यह पितृ ऋण है पुत्र, इससे उऋण होना परम आवश्यक है। विश्वपाद ने जवाब दिया यदि वंश वृद्धि ही आपका हेतु है दादाजी तो जिस ब्रह्मचर्य व्रत का मैं पूरी निष्ठा के साथ पालन कर रहा हूँ उसमें बहुत शक्ति होती है। मैं ब्रह्मचर्य को खंडित किए बिना भी वंश की वृद्धि कर सकता हूँ। इसके लिए विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं है। ब्रह्मचारी के पसीने और उसके आँसुओं में संतान पैदा करने की शक्ति होती है। पुराणों में इसके प्रमाण हैं, हम सभी जानते हैं की हनुमान जी के पसीने की बूँद को एक मछली ने पी लिया था जिससे मकरद्ध्वज का जन्म हुआ। मोर पंख को पवित्र माना जाता है क्योंकि मोर ब्रह्मचारी होता है मोरनी उसके आँसुओं को पी लेती है जिसके परिणाम स्वरूप मोर का जन्म होता है। मोर की पूरी प्रजाति ही ब्रह्मचारी मोर के आँसुओं से उत्पन्न होती है। इसलिए धैर्य धारण कीजिए आपका यह विश्वपाद ब्रह्मचारी है, इसे गुधौलियों को पैदा करने के लिए विवाह करने की नहीं-व्यायाम करने की ज़रूरत है ताकि “पसीना” निकल सके। वंश बढ़ाने के लिए मुझे विवाह नहीं- समाज की वेदना को स्वीकार करना होगा ताकि मेरे “आँसूँ” निकल सकें।

दादाजी उनकी बात सुनके चौंक गए और बोले बेटा विश्वपाद तुम आस्था के बहाव में आकर पूर्णतः अवैज्ञानिक बात कर रहे हो, तुम जैसे कानूनविद को यह अतार्किक बात शोभा नहीं देती। विश्वपाद न्यायाधीश के जैसे स्वर में बोले- दादाजी, ये अंग्रेज़ीपना छोड़िए जो तर्क, विज्ञान की बात करता है। अपनी संस्कृति आस्था- अनासक्ति को प्रधानता देती है। और आस्था में तर्क का कोई स्थान नहीं होता। मैं आपके परिवार का ज़रूर हूँ लेकिन आपके जैसा नहीं हूँ, सच बात तो ये है कि आप जैसे पहले वाले लोगों ने ही हमारी संस्कृति का सत्यानाश किया है, आपकी यही वन मोर, हैव मोर, वन्स मोर, के चक्कर में पड़ के हम लोग आसक्ति प्रधान हो गए, और अपने हिंदी वाले मोर को जो अनासक्ति का प्रतीक है उसको भूल गए। आप जैसे लोभी आसक्ति पूर्ण पुरखों के कारण ही हमारी पीढ़ी ये दिल माँगे मोर के मंत्र का जाप करने लगी। आसक्ति, अशांति का कारण होती है। हमारी वर्तमान अशांति का कारण आप लोगों की यही आसक्ति है। इसलिए नो मोर डिस्कशन। दिस इज़ माई फ़ाइनल डिसिज़न आई विल नॉट मैरी। रही बात वंश वृद्धि की, जिससे गुधौलिया वंश चल सके ? सो फ़ॉर देट..आई विल डोनेट माई टीअर्स..और ऑर्डर ऑर्डर कहके वे वहाँ से चले गए।

Hindi Poem : जब-जब सिर उठाया, अपनी चौखट से टकराया

दादाजी बेहद अनुभवी आदमी थे, वे समझ गए थे की विश्वपाद डिफ़ेक्टफ़ुल होते हुए भी अपने आपको एफ़्फ़ेक्टफुल सिद्ध करना चाहता है। अपनी पाद के लिए पुरखों को दोषी ठहरा रहा है। अपनी विकृति को जस्टिफ़ाई करने के लिए संस्कृति का हवाला दे रहा है। स्वयं हवा ख़राब करने के बाद ये उस हवा को दूषित करने का दोष समाज पर डालना चाहता है। दादाजी को क्रोध आ गया और उन्होंने ललकार कर कहा..अपनी औक़ात से ज़्यादा खाने वाले बदहज़मी के शिकार ! अन्न को पचाने में असमर्थ अपची !! पवित्र पद पर पदासीन पदोड़े !!! पाद की दम पे पहलवानी के शिखर पर पहुँचने वाले बिस्पाद !!!! कान खोल कर सुनले•• मैं गुधौलिया वंश का पितामह तुझसे शाप देता हूँ की आज से तुझे ना पसीना निकलेगा और ना ही आँसू। और दादाजी का श्राप सत्य हुआ.. बिस्पाद के साहब बन जाने के कारण वे एसी कार से निकलकर एसी दफ़्तर में पहुँचते हैं, जिससे उन्हें पसीना नहीं निकलता। अब उन्हें आँसू भी नहीं निकलते क्योंकि आँसू तो वेदना की उत्पत्ति होते हैं, विवेक की नहीं, चूँकि उनपर समाज को न्याय देने की ज़िम्मेदारी है- न्याय वेदना पर नहीं, विवेक पर आधारित होता है। कुछ लोगों का मानना है कि व्यक्ति का विवेक जागता ही तब है, जब उसकी वेदना मर जाती है।

इति वायवास्त्र कथा समाप्तम।

 

 

(साभार:आशुतोष राणा द्वारा लिखित हास्य व्यंग ‘विश्पाद गुधौलिया’)

-Mradul tripathi

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