सदाशय साहब की सदाशयता…

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पिछले दो दिनों से बैंककर्मियों की हड़ताल होने से आज बैंकों में आम दिनों से कुछ ज्यादा भीड़ थी । भीड़ का एक कारण यह भी था कि एटीएम से रुपयों की निकासी नहीं हो पा रही थी और ऊपर से विवाह का सीजन ।

एटीएम से बेरंग लौटे सत्यदेव के कदम तेजी से बैंक की और बढ़ रहे थे । यद्दपि उनके अपने ऑफिस पहुँचने में अभी पर्याप्त समय था ।

सत्यदेव बैंक पहुंचे तो आशंकानुसार केश काउंटर पर ग्राहकों की लम्बी कतार पाई । पसीना पोंछते हुए कतार में खड़े हो गए । बैंक का सेंट्रल एसी गर्मी से थोड़ी राहत पहुंचा रहा था ।

बैंकों के कार्यों की अपनी विशिष्ट गति होती है । उसी गति अनुपात में लाइन आगे बढ़ रही थी ।

अरे….अरे…कतार में लगो भाई सा…… हम भी तो कतार में लगे है । ए.. ऐ..

आवाज सुन सत्यदेव ने देखा एक व्यक्ति आवाज को अनसुना कर सीधे केश काउंटर पर पहुंच चुका था जो सम्भवतः केशियर का परिचित रहा होगा । कुछ पलों बाद ही वह केश गिनते हुए सत्यदेव के सामने से निकल गया ।

खुद को ठगा सा महसूस करते हुए सत्यदेव कतार में लगे अन्य लोगों से –

अब देखो..लोगों में इतना भी कॉमनसेंस नहीं है जब कतार लगी है तो कतार में आना चाहिए ना…इस देश में अनुशासन नाम की तो कोई चीज ही नहीं है साहब..और बैंक वालो को भी देखना चाहिए कि कतार में लगे लोगों को प्राथमिकता दे । सत्यदेव की बातों का लोगों ने पुरजोर समर्थन किया ।

कतार अपनी गति से आगे से कम और पीछे से बढ़ती रही ।

अपना नम्बर आने में २०-२५ मिनट और लगेंगे सत्यदेव ने अनुमान लगाया और आंशिक रूप से निश्चिंत हो बैंक में लगी विभिन्न सूचनाओं निर्देशों को पढ़ ही रहे थे कि बैंक में प्रविष्ट हुए बैंक मैनेजर सदाशय सा. से नज़रें मिली , परिचित होने से औपचारिक दुआ सलाम हुई ।

कुछ ही पलों के अंतराल से सत्यदेव बैंक मैनेजर के चेम्बर में मैनेजर सा. के सामने बैठे थे ।

हाँ सत्यदेवजी क्या हाल है ?

बस्स सर ठीक है…कुछ रुपये निकलवाना थे कतार तो लम्बी है ।

अरे …सुरेश ।।। बैंक मैनेजर ने अपने अधीनस्थ को आवाज लगा विथड्राल पर्ची सत्यदेव से ले उसे दे दी । थोड़ी ही देर में रुपये सत्यदेव के हाथों में थे ।

बैंक मैनेजर को धन्यवाद् देते हुए सत्यदेव विजयी मुद्रा में बैंक से बाहर निकल रहे थे ।

-डॉ. सुधीर महाजन

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