कहानी : आधुनिक वैदेही….

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उर्मिला के यहां शाम को आयोजित सुंदरकांड में वैदेही भी अपने पति संग आमंत्रित थी । वैदेही दोपहर से ही अपनी सहेली उर्मिला के घर पहुंच गई थी । वैदेही के पति राघव अपने ऑफिस उपरांत उर्मिला के घर पहुंचने वाले थे ।

शाम हुई सुंदरकांड का पाठ करने वाली मण्डली अपने साजो-सामान के साथ स्थापित हो चुकी थी। विधिवत पूजन-अर्चन के बाद संगीतमय सुंदरकांड का पाठ आरम्भ हुआ । माइक पर संगीत के साथ दोहों के स्वर में स्वर मिलने लगे । बीच-बीच मे दोहों में उल्लेखित घटनाक्रम की व्याख्या भी रोचक अंदाज में की जा रही थी ।

पाठ आरम्भ होने पर भी राघव नहीं पहुंचे तो वैदेही ने ऑफिस कॉल किया| असिस्टेंट ने बताया कि राघव साहब मीटिंग में है। झुंझलाकर वैदेही ने कॉल काट दिया ।

आधे घण्टे बाद फिर फोन किया तो राघव ने ऑफिस में ज़रूरी काम होने से आने में असमर्थता व्यक्त की, तिस पर वैदेही बिफर गई, “कभी धर्म के काम भी कर लिया करो..हमेशा काम ही काम …सुनो… यहां पर डिनर का भी इंतज़ाम है । अब मुझसे नहीं होगा कि देर रात घर पहुंचकर तुम्हारे लिए खाना बनाऊं, अपने हिसाब से देख लेना” इतना कहकर उसने फोन कट कर दिया ।

माइक के शोर में राघव वैदेही की केवल अंतिम पंक्तियां ही सुन सके थे ।

इधर माइक पर समवेत स्वर में दोहे पढ़ उनकी व्याख्या की जा रही थी –

तब देखी मुद्रिका मनोहर । 

राम नाम अंकित अति सुंदर ।

चकित चितव मुदरी पहिचानी ।

हरष बिषाद हृदय अकुलानी ।।

रामदूत हनुमान ने सीता को राम की अंगूठी दी तो उसे पहचानकर और उस पर अपने प्रिय राम का नाम अंकित देखकर सीता हर्ष से इस प्रकार खिल उठी मानो वे स्वयं राम के आगमन का अनुभव कर रही हों ।

बोलो सियावर रामचन्द्र की जय, पवनसुत हनुमान की जय…. की आवाज़ चारों दिशाओं में गूंज रही थी ।

वहीं दूसरी और राघव के कॉलबैक की रिंग वैदेही के पर्स में रखे मोबाइल से गूंज रही थी ।

-सुधीर महाजन 

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