Hindi Poetry : डॉ.बशीर बद्र की पुरकशिश शायरी और गज़लें

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सैयद मोहम्मद बशीर, जिन्हें उनके प्रशंसक डॉ.बशीर बद्र  (Bashir Badr Famous Poetry) के रूप में जानते हैं| इन्हें आम आदमी का शायर माना जाता है| इनकी शायरी से सभी स्वयं को जुड़ा हुआ मानते हैं| ज़िंदगी की आम बातों को बेहद ख़ूबसूरती और सलीके से अपनी ग़ज़लों में कह जाना बशीर बद्र साहब की ख़ासियत है। वर्ष 1936 को जन्मे डॉ.बशीर बद्र को साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। उर्दू के ये जाने-माने शायर अपनी सादा बयानी के लिए मशहूर हैं। उन्होंने उर्दू ग़ज़ल को एक नया लहजा दिया। यही वजह है कि उन्होंने श्रोता और पाठकों के दिलों में अपनी ख़ास जगह बनाई है।

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आइये पढ़ते हैं उनकी पुरकशिश शायरी और गज़लें (Bashir Badr Famous Poetry, Shayari, Gazal) :

हरदिल अजीज शायरी 

जिंदगी तू मुझे पहचान न पाई लेकिन
लोग कहते हैं कि मैं तेरा नुमाइंदा हूं।

बस गई है मेरे अहसास में ये कैसी महक
कोई ख़ुशबू मैं लगाऊं, तेरी ख़ुशबू आए।

तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आंखें हमारी कहां से लाएगा।

उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।

जिस दिन से चला हूं मिरी मंज़िल पे नज़र है
आंखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।

हम भी दरिया हैं, हमें अपना हुनर मालूम है,
जिस तरफ़ भी चल पड़ेंगे, रास्ता हो जाएगा।

मकां से क्या मुझे लेना मकां तुमको मुबारक हो
मगर ये घास वाला रेशमी कालीन मेरा है।

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।

हर धड़कते पत्थर को, लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है, दिल को दिल बनाने में।

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।

कोई हाथ भी न मिलाएगा,जो गले मिलोगे तपाक से
ये नये मिज़ाज का शहर है,ज़रा फ़ासले से मिला करो।

सियासत की अपनी अलग इक ज़बां है
लिखा हो जो इक़रार, इनकार पढ़ना।

किसी की राह में दहलीज़ पर दिया न रखो
किवाड़ सूखी हुई लकड़ियों के होते हैं

मुझसे बिछड़ के ख़ुश रहते हो
मेरी तरह तुम भी झूठे हो
इक टहनी पर चांद टिका था
मैं ये समझा तुम बैठे हो

वो शाख है न फूल, अगर तितलियां न हों
वो घर भी कोई घर है जहां बच्चियां न हों

कवि प्रदीप, जिनका गीत सुन नेहरुजी की आँखों में आ गए थे आंसू

# वो चांदनी का बदन

वो चांदनी का बदन ख़ुशबुओं का साया है
बहुत अज़ीज़ हमें है मगर पराया है

उतर भी आओ कभी आसमाँ के ज़ीने से
तुम्हें ख़ुदा ने हमारे लिये बनाया है

महक रही है ज़मीं चांदनी के फूलों से
ख़ुदा किसी की मुहब्बत पे मुस्कुराया है

उसे किसी की मुहब्बत का ऐतबार नहीं
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है

तमाम उम्र मेरा दम उसके धुएँ से घुटा
वो इक चराग़ था मैंने उसे बुझाया है

# एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं 

एक चेहरा साथ-साथ रहा जो मिला नहीं
किसको तलाश करते रहे कुछ पता नहीं

शिद्दत की धूप तेज़ हवाओं के बावजूद
मैं शाख़ से गिरा हूँ नज़र से गिरा नहीं

आख़िर ग़ज़ल का ताजमहल भी है मकबरा
हम ज़िन्दगी थे हमको किसी ने जिया नहीं

जिसकी मुखालफ़त हुई मशहूर हो गया
इन पत्थरों से कोई परिंदा गिरा नहीं

तारीकियों में और चमकती है दिल की धूप
सूरज तमाम रात यहाँ डूबता नहीं

किसने जलाई बस्तियाँ बाज़ार क्यों लुटे
मैं चाँद पर गया था मुझे कुछ पता नहीं

कवि गोपालदास सक्सेना की बेहतरीन रचनाएं

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