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इस दिवाली डर को डराना है

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डर ऐसी नकारात्मक मनोदशा है, जो किसी भी व्यक्ति से उसका मनोबल छीन लेती है| इसे पूरी तरह से दूर करना असंभव है, लेकिन कुछ प्रयास से डर को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है| डर सभी को लगता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति हमेशा ऐसी स्थिति में रहने लगे तो उसे सचेत हो जाना चाहिए| भले ही इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता, लेकिन ईमानदारी से आत्म मूल्यांकन करते हुए इसे मैनेज करने की कोशिश तो करना ही चाहिए|

क्या है डर की असली वजह

पारिवारिक पृष्ठभूमि और परवरिश के तौर-तरीके का असर इंसान के व्यक्तित्व पर सारी उम्र बना रहता है| मनोवैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन में यह साबित हो चुका है कि जिन बच्चों को परवरिश सख्त अनुशासन के संरक्षण भरे माहौल में होती है, बड़े होने के बाद उनका मनोबल कमजोर पड़ जाता है| यदि छोटी-छोटी गलतियों पर कड़ी सज़ा दी जाए तो ऐसे बच्चे माता-पिता की अनुमति के बगैर निर्णय लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाते और यही आदत उन्हें हमेशा के लिए डरपोक बना देती है|

जीवन पर नकारात्मक प्रभाव

किसी भी कार्य की शुरुआत करने से पहले नाकामी के बारे में न सोचें| आपकी यह आदत आपको आगे बढ़ने से रोकती है| हर बार किसी व्यक्ति विशेष से पूछना भी आपको कमजोर बनाता है, इससे आपकी सोचने-समझने की क्षमता भी कमजोर होती है| ऐसे में आप सही गलत की पहचान नहीं कर पाते इसलिए नकारात्मक मनोदशा से बाहर निकलना ज़रूरी है|

कभी ना भूलें

किसी भी रिश्ते में भावनात्मक निर्भरता की अति से बचें क्योंकि इससे व्यक्ति खुद से ज्यादा दूसरों पर भरोसा करने लगता है| यदि इस तरह की स्थिति आ भी जा रही है तो उससे निकलने का प्रयास करें ना कि भागने का| जब भी विपरीत परिस्थितियां हो और दिमाग में से ख़याल आ रहे हो तो मन को शांत करके बैठ जाएं, कोई हल आपके आसपास ज़रूर मिल जाएगा|

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