दक्षिण कोरिया की पूर्व राष्ट्रपति को जेल

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कानून व्यवस्था हर देश में अलग-अलग हो सकती है, लेकिन इन्साफ की परिभाषा  पूरे विश्व में एक ही होती है| भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा है, जो किसी भी देश की प्रशासनिक और आर्थिक स्थिति को खोखला कर देता है, और जब ऐसे मामलों के गुनहगार देश के राष्ट्रपति या कोई नेता हो तो मुद्दा और भी बड़ा हो जाता है|

हाल ही में दक्षिण कोरिया की पूर्व राष्ट्रपति पार्क गुन हे भ्रष्टाचार के मामले में दोषी साबित हुई हैं| शुक्रवार को भ्रष्टाचार के आरोप में 10 माह से चल रहे मुकदमे में पार्क को 24 साल की सजा सुनाई गई | पार्क पर पद का गलत इस्तेमाल करने और सत्ता का दुरूपयोग करने के आरोप भी शामिल हैं| 130 करोंड़ के रिश्वत लेने के आरोप में पार्क को यह सजा मिली है| पार्क पर सजा के अलावा 110 करोड़ का जुर्माना भी लगाया गया है|

भ्रष्टाचार के आरोप में समय-समय पर कई भारतीय नेताओं के नाम सामने आए हैं| देश की अर्थव्यवस्था ऐसे कई भ्रष्ट नेताओं और उद्यमियों के घोटालों से चोटिल हुई है, लेकिन दक्षिण कोरिया की यह खबर हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे देश में भी भ्रष्ट नेताओं को इतने कम समय में इतनी कड़ी सजा दी जाती है| जहां एक ओर दक्षिण कोरिया में 10 माह में ही इस मामले पर फैसला सुना दिया गया, वहीं भारत में ऐसे कई भ्रष्टाचार के मामलों पर कई वर्षों से मुक़दमे चल रहे हैं|

किसी भी मामले में इतना सख्त फैसला शायद ही आया हो| 130 करोड़ के इस घोटाले में 110 करोड़ का जुर्माना लगाया गया है, जिससे यह साफ़ होता है कि पार्क को यह रिश्वत लेना कितना महंगा पड़ा, जबकि भारत में हज़ार करोड़ के घोटालों पर भी इतना जुर्माना नहीं लगाया जाता है| नेताओं और बड़ी हस्तियों को देर से सजा देने या सजा न देने के मामले में भारत अव्वल है| मुक़दमे सालों तक कोर्ट में रहते हैं और यदि फैसले आए भी तो कई बार बिना सबूत और सिस्टम की विफलताओं के कारण आरोपी को सजा नहीं हो पाती है| यहां किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार के आरोप में इतनी लम्बी सजा नहीं दी जाती है| सिस्टम की मेहरबानी ने देश में भ्रष्टाचार को रोज की खबर बना दी है|

दक्षिण कोरिया से भारत इस मामले में सीख सकता है कि भ्रष्टाचारी राष्ट्रपति हो या आम आदमी, सजा इतनी सख्त हो कि देश में घोटाले कम हो और आर्थिक विकास के नए मार्ग खुलें|

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