क्या मप्र की राजनीति में फिर होगी उमा भारती की वापसी ?

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मध्यप्रदेश चुनाव के लिए पार्टियों ने अपनी कमर कस ली है। भाजपा ने कार्यकर्ता महाकुंभ कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर दिया। वहीं कांग्रेस की तरफ से अध्यक्ष राहुल गांधी ने सभा कर अपनी शक्ति दिखा दी। भाजपा के कार्यकर्ता महाकुंभ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अमित शाह, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, पूर्व सीएम उमा भारती, पूर्व सीएम और वर्तमान विधायक बाबूलाल गौर, प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह सहित पार्टी के सभी दिग्गज नेता मौजूद रहे।

भाजपा कार्यकर्ता महाकुंभ के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में पूर्व मुख्यमंत्री उमा  भारती हैं। करीब आठ वर्ष बाद उमा भारती मध्यप्रदेश में भाजपा के किसी बड़े मंच पर दिखाई दीं। उमा भारती का प्रदेश के कार्यक्रम में शामिल होना बताता है कि आगामी चुनाव में उमा भारती भाजपा के लिए तुरुप का इक्का है। उमा भारती ने कहा कि पहले नहीं आने वाली थीं, लेकिन सीएम शिवराज ने उनसे कहा कि उनके आने से फायदा होगा तो वे आ गईं।

साफ है कि चुनावों में भाजपा को लगा कि प्रदेश में उमा भारती के आने से फायदा होगा तो उनकी वापसी मध्यप्रदेश में हो सकती है। उमा ने बातों ही बातों में कार्यकर्ताओं को चैलेंज भी दिया कि उनके नेतृत्व में जितनी विधानसभा सीटें आई थी फिर उतनी सीटें जीतकर दिखाएं तो उन्हें खुशी मिलेगी। उमा ने कहा कि वे मध्यप्रदेश की बेटी हैं, जिन्हें अब उत्तरप्रदेश में मान मिला है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उमा बुंदेलखंड संभाग से किसी सीट पर लोकसभा चुनाव लड़ सकती हैं। यह तय है कि विधानसभा चुनावों के प्रचार में भाजपा उनका इस्तेमाल कर सकती है।

उमा भारती के राजनीतिक जीवन पर एक नज़र

उमा भारती का राजनीतिक सफ़र ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिंधिया के सान्निध्य में शुरू हुआ। 1984 में उमा भारती ने पहला लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वे हार गईं, लेकिन 1989 में खजुराहो से दोबारा चुनाव लड़ीं और जीत गईं। इसके बाद वर्ष 1999 में उन्होंने भोपाल से चुनाव जीता। राम जन्मभूमि आंदोलन में उमा भारती ने प्रमुख भूमिका निभाई थी। उन का दिया नारा ‘रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ काफी प्रचलित हुआ था। साल 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने के बाद वे मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री बनी, लेकिन उनका कार्यकाल सिर्फ 1 वर्ष का ही रहा क्योंकि 1994 के हुबली दंगों के लिए उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुआ। इस कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी का विरोध करते हुए शिवराजसिंह चौहान को सीएम बनाए जाने का भी विरोध किया, जिसके बाद उन्हें इस्तीफा देने को कहा गया।

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