उपसरपंच भी गांव छोड़कर नौकरी की तलाश में

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देश के युवाओं के लिए रोजगार की समस्या आम है| मध्यप्रदेश के सूखा प्रभावित छतरपुर जिले के युवाओं का नौकरी की तलाश में घर छोड़ना कोई नई बात नहीं है| यहां हालात इतने बुरे हो चुके हैं कि सिर्फ आम लोग ही नहीं, उनके द्वारा चुने गए जनप्रतिनिधि भी नौकरी की तलाश में बड़े शहरों का रुख करने पर मजबूर हैं|

हैरानी की बात नहीं है कि एक दलित सरपंच मंजू अहिरवार को नौकरी की तलाश में दिल्ली जाना पड़ा क्योंकि उनके पास पैतृक गांव छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं था| मंजू अब दिल्ली में रहती हैं और अपने गांव खड़गावां बहुत कम आती हैं| मंजू अपने घर में शौचालय बनाने के लिए मार्च में खड़गावां आई थीं|

जब पिछली बार मंजू गांव आई थीं, तब उन्होंने बातचीत के दौरान बताया कि ‘यदि घर में टॉयलेट न होता तो हमारे राशन कार्ड रद्द कर दिए जाते| मैं उपसरपंच जरूर हूं, लेकिन मुझे अपना परिवार चलाने के लिए पैसों की जरूरत है| पंचायतें सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रही हैं और पेयजल की कमी से जूझ रहे परिवारों की मदद नहीं कर पा रही हैं| मेरे परिवार के पास 3.5 हेक्टेयर जमीन है, लेकिन पानी नहीं है| ऐसे में घर छोड़ना ही जिंदा रहने के लिए एकमात्र तरीका है| इसके अलावा मैं तीन लाख के कर्ज में भी डूबी हूं|’

यह स्थिति प्रदेश में युवाओं के रोजगार को लेकर हो रही समस्या को उजागर करती है| सरकार रोजगार को लेकर कितने भी दावे कर ले, प्रदेश के युवाओं को अभी भी इस परेशानी का सामना करना पड़ रहा है|

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