हाईकोर्ट : दुर्लभ बीमारियों का मुफ्त इलाज बीपीएल का ही क्यों ?

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दुर्लभ बीमारियों का मुफ्त इलाज मुहैया करवाने पर हाईकोर्ट ने सवाल उठाए हैं। हाईकोर्ट ने केंद्र और दिल्ली सरकार से चार हफ्तों के अंदर जवाब मांगा है कि राष्ट्रीय नीति का लाभ आख़िर क्यों बीपीएल मरीज़ों तक सीमित है। कोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है कि इस नीति का लाभ सभी आय वर्गों के मरीजों को क्यों न दिया जाए। हाईकोर्ट के आदेश पर पिछले वर्ष 26 मई को केंद्र सरकार ने दुर्लभ और अनुवांशिकी बीमारियों के मुफ्त उपचार के लिए राष्ट्रीय नीति को नोटिफाई किया था।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट दो लड़कियों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिनका दावा था कि दुर्लभ रोगों के उपचार के लिए राष्ट्रीय नीति गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल) के रोगियों के साथ भेदभाव करती है। यह याचिका सुनवाई के लिए न्यायाधीश विभू बाखरू के सामने आई है। उन्होंने स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर दोनों याचिकाओं पर जवाब मांगा है।

एक याचिकाकर्ता साढ़े चार वर्ष की बच्ची है, जो एमपीएस-1 से पीड़ित है और दूसरी 10 साल की लड़की एसएए-1 रोग से पीड़ित है। उनका कहना है कि इन दुर्लभ बीमारियों का इलाज़ बहुत महंगा है और उनके माता-पिता इसका खर्च उठाने में असमर्थ है। एमपीएस-1 रोग में शरीर के विभिन्न अंग एवं ऊतक के आकार बढ़ जाते हैं। याचिकाएं अधिवक्ता अशोक अग्रवाल ने द्वारा दायर की गई थी। साढ़े चार वर्ष की बच्ची को एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी की आवश्यकता है, वहीं 10 साल की लड़की को स्पीनरजा नाम की दवा की जरूरत है। यह दवा अमरीका, कनाडा, ब्राजील और जापान में मिलती है। अदालत इसकी अगली सुनवाई 10 दिसंबर को करेगा।

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