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SC-ST कर्मचारियों के प्रमोशन पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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प्रमोशन में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुना दिया है| सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रमोशन में आरक्षण ज़रूरी नहीं, राज्य सरकार चाहे तो एससी-एसटी को प्रमोशन में आरक्षण दे सकती है| इसी के साथ एससी ने कहा कि एससी-एसटी के प्रमोशन के आंकड़े जुटाना ज़रूरी नहीं है| फैसला सुनाते हुए जस्टिस नरीमन ने कहा कि नागराज मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला सही था इसलिए इस पर फिर से विचार करना ज़रूरी नहीं है| यानी इस मामले को दोबारा 7 जजों की पीठ के पास भेजना ज़रूरी नहीं है|

वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की संविधान पीठ ने सरकारी नौकरियों में प्रमोशन में आरक्षण को लेकर फैसला दिया था| उस समय कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ इस तरह की व्यवस्था को सही बताया था| पांच जजों की बेंच ने इस मुद्दे पर निष्कर्ष निकाला कि सरकारी नौकरी में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को प्रमोशन में आरक्षण देने के लिए सरकार बाध्य नहीं है| हालांकि यदि वे अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करना चाहते हैं और इस तरह का प्रावधान करना चाहते हैं तो राज्य को वर्ग के पिछड़ेपन और सरकारी रोजगार में उस वर्ग के प्रतिनिधित्व की अपर्याप्तता दिखाने वाला मात्रात्मक डेटा एकत्र करना होगा|

12 वर्ष बाद भी न तो केंद्र और न राज्य सरकारों ने ये आंकड़े दिए| इसके बजाय कई राज्य सरकारों ने प्रमोशन में आरक्षण के कानून पास किए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के चलते ये कानून रद्द होते गए| एससी-एसटी संगठनों ने प्रमोशन में आरक्षण की मांग को लेकर 28 सितंबर को बड़े आंदोलन का ऐलान कर रखा है|

इस फैसले पर पुनर्विचार के लिए दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 30 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था| प्रधान  न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्ष वाली बेंच में जस्टिस कूरियन जोसेफ, जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​शामिल हैं, जिन्होंने यह फैसला सुनाया|

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