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सुप्रीम कोर्ट ने दिए जांच अधिकारी को गिरफ्तारी के अधिकार

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दहेज उत्पीड़न के कानून में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बदलाव किया है। पहले शिकायत होते ही गिरफ्तारी का नियम था, लेकिन अब ऐसा ज़रूरी नहीं कि शिकायत दर्ज होते ही आरोपियों की गिरफ्तारी हो। यदि जांच अधिकारी को ज़रूरत लगी तो वह तुरंत गिरफ्तारी भी कर सकता है। दहेज उत्पीड़न क़ानून (498 A) पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फ़ैसला सुनाया है।

दहेज उत्पीड़न की शिकायतों पर तुरंत गिरफ्तारी रोकने वाले फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने बदलाव किया है। अब इस क़ानून के तहत महिला की शिक़ायत पर उसके पति और ससुराल वालों की गिरफ़्तारी में ‘परिवार कल्याण समिति’ की कोई भूमिका नहीं होगी। अब गिरफ्तारी का निर्णय कोर्ट ने जांच अधिकारी की संतुष्टि पर छोड़ दिया है। पुराने फैसले में दी गई कई और रियायतों को भी बरकरार रखा गया है।

पिछले कुछ सालों में दहेज उत्पीड़न के मामलों में बेवजह गिरफ्तारी और ज़मानत न मिलने के काफी मामले सामने आये थे इसलिए सुप्रीम कोर्ट को ये दिशा-निर्देश देने पड़े। भारत के चीफ़ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ की बेंच ने यह फ़ैसला सुनाया है। इसी साल 23 अप्रैल को कोर्ट ने सुनवाई के बाद इस मामले में फ़ैसला लिया था, जिसे कोर्ट ने अपने पास सुरक्षित रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने नए फैसले में कहा है कि विशेष परिस्थितियों के लिए बने कानून का कुछ लोग लाभ उठाने की कोशिश करते हैं, जिससे बेगुनाह लोगों को भी सज़ा काटनी पड़ती है। कोर्ट के इस फैसले के बाद कानून के दुरुपयोग को रोका जा सकेगा।

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