भीमा-कोरेगांव हिंसा प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया फैसला

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एक जनवरी 2018 को महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव में हुई हिंसा के आठ महीने बाद आज सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया है। इतिहासकार रोमिला थापर और अन्य चार लोगों ने पुलिस द्वारा गिरफ्तार पांच सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के विरोध में एसआईटी की जांच की याचिका लगाई थी, जिस पर कोर्ट ने आज फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए पांचों कार्यकर्ताओं की नजरबंदी को चार हफ्तों तक के लिए बढ़ा दिया है। पिछले कई दिनों से हाउस अरेस्ट की सज़ा काट रहे इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को अब चार हफ्तों तक और अपने ही घर में कैद रहना पड़ेगा। इस फैसले से इन कार्यकर्ताओं को कुछ राहत भी मिली है क्योंकि अगली सुनवाई तक गिरफ्तारी पर रोक लग चुकी है।

गौरतलब है कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने 20 सितंबर को दोनों पक्षों के वकीलों की दलील सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रखा था। इसके बाद रोमिला थापर सहित अन्य चार कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी के खिलाफ याचिका दायर की|

इस याचिका में कार्यकर्ताओं की रिहाई के साथ-साथ मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। बाद में पांचों कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विरोध को रोकेंगे तो लोकतंत्र टूट जाएगा। असहमति हमारे लोकतंत्र का सेफ्टी वॉल्व है| यदि आप प्रेशर कुकर में सेफ्टी वॉल्व नहीं लगाएंगे तो वह फट सकता है।”

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