राजस्थान में ‘राजपूत’ बदलते हैं राजनीति का इतिहास…

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राजस्थान में राजनीतिक आग चरम पर है। सभी पार्टियों ने सियासी दांव-पेंच लगाना शुरू कर दिए हैं। पार्टियों ने अपनी कमर भी कस ली है। चुनाव से पहले नेताओं के बागी तेवर साफ तौर पर दिखाई देने लगे हैं, लेकिन राजस्थान में राजपूत नेताओं का अच्छा प्रभाव है। राजपूत राजस्थान चुनाव में काफी अहम हैं। जिस पार्टी को उनका समर्थन मिलता है, उसकी जीत की संभावना बढ़ जाती है। कई दिग्गज राजपूत नेता रहे हैं, जिन्होंने नाराज़गी के कारण चुनाव से पहले दूसरी पार्टी का दामन थामा है। इन्होंने जिस पार्टी का दामन थामा, पार्टी ने उसका लाभ उठाने में ज़रा भी देर नहीं की।

लोकेंद्रसिंह कालवी / कल्याणसिंह कालवी

राजपूतों की राजनीति में नागौर के नेता कल्याणसिंह कालवी का दर्जा काफी ऊपर है। वर्ष 1985 में कल्याणसिंह डेगाना से जनता पार्टी के विधायक बने और भैरोंसिंह सरकार में कृषि मंत्री रहे। 1989 में जनता दल से चुनाव लड़ा और सांसद बने। उनके बेटे लोकेंद्र सिंह कालवी ने राजनीति की शुरुआत भाजपा से की। 1998 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद लोकेंद्र भाजपा छोड़ कांग्रेस में आ गए और उसके बाद बसपा में शामिल हो गए। अब लोकेंद्र करणी सेना के संयोजक हैं।

महेंद्रा कुमारी / भंवर जितेंद्रसिंह

दिग्गज नेता भंवर जितेंद्रसिंह का परिवार लंबे वक्त से भाजपा के साथ रहा। उनकी माता महेंद्रा कुमारी भाजपा से सांसद रहीं, लेकिन भाजपा से मनमुटाव होने के कारण निर्दलीय चुनाव में उतर गईं। वर्ष 1998 में महेंद्रा कुमारी कांग्रेस में शामिल हो गईं। महेंद्रा कुमारी के बाद उनके बेटे भंवर जितेंद्रसिंह को कांग्रेस ने अलवर से विधानसभा टिकट दिया। भंवर जितेंद्रसिंह 1998 और 2003 में लगातार दो बाद अलवर से विधायक बने। वर्ष 2009 में भंवर जितेंद्रसिंह को कांग्रेस ने लोकसभा का टिकट दिया और वे जीत भी गए।

भवानीसिंह-दीया कुमारी

जयपुर राजपरिवार के पूर्व महाराज भवानीसिंह ने राजनीतिक पारी की शुरुआत कांग्रेस से की। भवानीसिंह 1989 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े थे, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 2013 में भाजपा ने भवानीसिंह की बेटी राजकुमारी दीया भारती को टिकट दिया और वे सवाईमाधोपुर सीट से चुनाव जीत गईं।

दिग्विजयसिंह उनियारा

दिग्विजयसिंह उनियारा ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत स्वतंत्रता पार्टी से की, फिर जनता पार्टी के टिकट पर 1967 और 1977 में विधायक बने। बाद में दिग्विजय जनता दल में शामिल हो गए और 1990 में विधायक चुनाव जीत गए। बाद में दिग्विजय ने कांग्रेस का दामन थाम लिया और कांग्रेस के टिकट पर 1998 में चुनाव जीत गए। हालांकि 2003 के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा।

महाराणा महेंद्रसिंह मेवाड़

महाराणा महेंद्रसिंह मेवाड़ ने वर्ष 1989 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत गए। 1991 में भाजपा ने महेंद्रसिंह को टिकट नहीं दिया तो वे कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन वे चुनाव हार गए। अभी महाराणा महेंद्रसिंह राजनीति में सक्रिय नहीं हैं।

गोपालसिंह भादराजून

जालौर के पूर्व राजपरिवार के गोपालसिंह भादराजून जनता पार्टी के टिकट पर आहोर के विधायक बने, लेकिन बाद में जनता पार्टी को छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस के टिकट पर आहोर के विधायक भी बने।

 गजेंद्रसिंह खिंवसर / ओंकारसिंह खिंवसर

गजेंद्रसिंह खिंवसर के पिता ओंकारसिंह राजस्थान कांग्रेस में महासचिव और उपाध्यक्ष रहे। उन्होंने कांग्रेस की सीट से चुनाव भी लड़ा, लेकिन चुनाव हार गए। ओंकारसिंह के पुत्र गजेंद्रसिंह भाजपा में शामिल हो गए। गजेंद्रसिंह भाजपा के टिकट पर 2003, 2008 और 2013 में लोहावच से विधायक बने।

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