खतना पर SC : क्या महिलाएं पालतू मवेशी हैं?

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देश में अभी भी कई प्रथाओं का बोझ समाज लगातार ढो रहा है| ऐसी प्रथाएं, जिनसे किसी का फायदा नहीं हो सकता है| समाज सब कुछ जानते हुए भी इन प्रथाओं से मुक्त नहीं हो रहा है| बोहरा मुस्लिम समुदाय में बच्चियों के खतना की प्रथा भी बहुत दर्दनाक है, लेकिन फिर भी समाज इससे मुक्ति पाने के बजाय इसके पालन करने पर जोर दे रहा है|

बोहरा मुस्लिम समुदाय में प्रचलित खतना करने की प्रथा के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई| कोर्ट ने कहा कि यह प्रथा महिलाओं की गरिमा को चोट पहुंचाने वाली लगती है| इस व्यवस्था को बनाए रखने के पक्ष में धार्मिक संगठनों की दलीलें अभी बाकी हैं, मामले की सुनवाई पूरी नहीं हुई है|

याचिकाकर्ता सुनीता तिवारी के वकील ने बताया कि बोहरा मुस्लिम समुदाय इस व्यवस्था को धार्मिक नियम मानता है| उनका मानना है कि 7 साल की लड़की का खतना कर दिया जाना चाहिए, इसके बाद ही वे शुद्ध होती हैं और ऐसी औरतों को ही पति पसंद करते हैं| खतना की प्रक्रिया को अप्रशिक्षित लोग अंजाम देते हैं| कई मामलों में बच्ची का इतना ज्यादा खून बह जाता है कि वे गंभीर स्थिति में पहुंच जाती हैं|

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस मामले की सुनवाई के दौरान कहा, “महिला सिर्फ पति की पसंदीदा बनने के लिए ऐसा क्यों करे? क्या वो पालतू मवेशी है? उसकी भी अपनी पहचान है| उनका जन्म सिर्फ शादी करने के लिए नहीं होता है|“

बेंच के सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा, “सवाल यह है कि कोई भी महिला के जननांग को क्यों छुए? वैसे भी धार्मिक नियमों के पालन का अधिकार इस सीमा से बंधा है कि नियम ‘सामाजिक नैतिकता’ और ‘व्यक्तिगत स्वास्थ्य’ को नुकसान पहुंचाने वाला न हो|” मामले की सुनवाई आगे जारी रहेगी|

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