मजदूर की बेटियां चाहती हैं देश के लिए खेलना

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जब सपने खुली आंखों से देखे जाएं और पूरी लगन से मेहनत की जाए तो उन्हें पूरे होने से कोई नहीं रोक सकता| यह साबित करती हैं छत्तीसगढ़ की मजदूर दंपति की दो बेटियां| छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर की ये दो बेटियां एक ऐसे वर्ग से आती हैं, जहां जन्म लेने के बाद से ही बच्चा यह समझ जाता है कि उसे भी मजदूरी ही करनी पड़ेगी, लेकिन परिस्थतियों से बिना डरे मजदूर माता-पिता की दो बेटियों ने तलवारबाजी जैसे खेल को चुना और सफल तलवारबाज़ बनकर राष्ट्रीय पदक विजेता बनीं|

यही नहीं इन दोनों बहनों को छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्कृष्ट खिलाड़ी पुरस्कार से भी नवाज़ा, लेकिन जीविका और शिक्षा के लिए बेटियों का संघर्ष अब भी बरकरार है| बावजूद इसके दोनों देश के लिए ओलंपिक मेडल जीतना चाहती हैं|

बिलासपुर, छत्तीसगढ़ के चिंगराजपारा की निवासी बहनें शीला और मुन्नी देवांगन बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखती हैं| माता-पिता मजदूरी करते हैं| स्थानीय, जिला और राज्य स्तर पर आगे बढ़ते हुए दोनों ने राष्ट्रीय स्पर्धा में हिस्सा लिया और अपना मुकाम बनाया| दोनों बहनों का कहना है कि माता-पिता और परिवार को समाज में प्रतिष्ठा दिलाने की चाह में प्रयास जारी रहा और खेल कब जुनून में तब्दील हो गया, पता ही नहीं चला|

हालांकि हालात कठिन थे| बीच-बीच में पिता के काम में सहयोग भी किया| उपलब्धियां मिलती गईं, लेकिन परिवार की जीविका और अपनी शिक्षा को जारी रखने के लिए अब भी संघर्ष करना पड़ रहा है| अब फिटनेस ट्रेनर के रूप में भी काम करती हैं| पढ़ाई भी जारी है| दोनों बहनों को राज्य सरकार 2015- 16 में उत्कृष्ट खिलाड़ी के पुरस्कार से भी नवाज़ चुकी हैं। बहरहाल, संघर्ष से जूझ रही दोनों बहनों का कठिनाइयों ने दामन नहीं छोड़ा है| शीला ने बताया कि उनके साथ के अन्य खिलाड़ियों को खेल कोटे में नौकरी मिल गई है, लेकिन वे पिछले डेढ़ साल से भटक रही हैं|

लगातार सात सालों से नेशनल खेलने के बाद भी इन्हें कहीं से कोई प्रोत्साहन और आर्थिक मदद भी नहीं मिली| इसके बाद भी देश के लिए मेडल लाने की चाह बनी हुई है| दोनों बहनों का कहना है कि शासन का साथ नहीं मिला तो क्या, देश के लिए खेलना ही हमारे लिए गर्व की बात है|

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