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राम तेरी गंगा मैली नही ज़हरीली…

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नमामि गंगे योजना में सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है (Namami Gange)। और गंगा को स्वच्छ बनाने के प्रयास बेहद ही जोर-शोर से किए जा रहे हैं। यह परियोजना गंगा की सफाई के लिए चलाई जा रही है। लेकिन इस परियोजना का गंगा नदी पर उल्टा ही असर देखने को मिल रहा है। जहां इस परियोजना के बाद से गंगा में सफाई दिखना चाहिए थी, वहीँ इस योजना के चलाए जाने के बाद से गंगा और भी प्रदूषित नज़र आने लगी है।

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केंद्र सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में से एक गंगा की सफाई के लिए 20,000 करोड़ रु. की ‘नमामि गंगे’ योजना विफल होती नज़र आ रही है (Namami Gange)। इस बात का खुलासा संकट मोचन फाउंडेशन द्वारा लिए गए गंगा नदी के सैंपल के विश्लेषण से हुआ। इन सैंपल की जांच से यह बात निकलकर सामने आई है कि, नदी के पानी में कोलीफार्म बैक्टीरिया और बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) में काफी इजाफा हुआ है। गौरतलब है कि यही दो प्रमुख पैमाने हैं जो पानी की गुणवत्ता की जांच करते हैं। साल 2015 के मई माह में केंद्र सरकार ने नमामि गंगे परियोजना की शुरुआत की थी। इस स्कीम की शुरुआत गंगा को स्वच्छ बनाने के लिए की गई थी।

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प्रधानमंत्री ने इस योजना के तहत गंगा को पूरी तरह से निर्मल बनाने के लिए साल 2019 तक का लक्ष्य निर्धारित किया था। इस तय समय सीमा में गंगा नदी को पूरी तरह से साफ़ किया जाना था। लेकिन तय समय-सीमा तक गंगा को साफ़ बनाना तो दूर बल्कि उसे और भी दूषित बना दिया गया। हालांकि पिछले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने इस योजना की समयावधि को 2020 तक बढ़ा दिया था। उन्होंने मार्च 2020 तक के लिए इस समय को बढ़या था।

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Namami Gange : इस योजना के लांच होने के बाद से ही एनजीओ SMF गंगा के पाने की गुणवत्ता पर पैनी नज़र रख रहा है। SMF एनजीओ की अपनी लेबोरेटरी है जहां गंगा नदी के पानी के सैंपल को जांचा-परखा जाता है। जिस सैम्पल की जांच एनजीओ द्वारा हाल ही में की गई है वह तुलसी घाट से लिया गया है। इस सैम्पल की जांच में जल प्रदूषण काफी ज्यादा सामने आया है। एनजीओ के प्रेसिडेंट वीएन मिश्रा ने कहा, “साल 2016-फरवरी 2019 के बीच बीओडी लेवल 46.8-54mg/l से बढ़कर 66-78mg/l हो गया है। डिजॉल्व्‍ड ऑक्सीजन (DO) 6mg/l या इससे ज्यादा होना चाहिए। इस अवधि में इसका स्तर 2.4mg/l से घटकर 1.4mg/l रह गया है।”

प्रभात

 

ऐसे भी चोर…

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