गोपालदास नीरज के साथ हुआ साहित्य के एक दौर का निधन

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आंसू जब सम्मानित होंगे मुझको याद किया जाएगा
जहाँ प्रेम का चर्चा होगा मेरा नाम लिया जाएगा…    

इस रचना को अपना अमर गीत बनाने वाले मशहूर कवि और साहित्यकार गोपाल दास नीरज अब भौतिक रूप से इस संसार में नहीं है, लेकिन उनके अमर गीत आज भी लोगों के दिलों में उसी अमरता के साथ निहित हैं| देश के जाने माने साहित्यकार नीरज ने गुरुवार शाम अंतिम सांस ली|

‘लिखे जो खत तुझे, जो तेरी याद में’ 1968 में आई फिल्म ‘कन्यादान’ का एक ऐसा गीत था जो आज भी लोगों की जुंबा पर कायम है| गोपाल दास नीरज को जब बताया गया कि गीत शशि कपूर पर फिल्माया जाना है तो उन्होंने मात्र 6 मिनट में यह गीत लिख दिया| उन्हें साल 1970,71 और 72, लगातार तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार मिला| 1970 में काल का पहिया घूमे रे भईया, 1971 में बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं और 1972 में ए भाई…ज़रा देख के चलो, जैसे गीतों के लिए गोपालदास नीरज को फिल्म फेयर पुरस्कार मिलते रहे| इसके इतर ‘शोखियों में घोला जाए फूलों का शवाब’, कारवां गुज़र गयां जैसे गीतों के लिए लोग कवि सम्मेलन में भी नीरज को गुनगुनाते नज़र आने लगे| उनकी कलम से कई ऐसे गीत निकले जिन्होंने उन्हें फिल्म जगत में मकबूल किया|

गोपालदास सक्सेना ‘नीरज’ का जन्म 4 जनवरी 1924 को इटावा जिले के पुरावली गांव में हुआ था. मात्र छह साल की उम्र में पिता ब्रजकिशोर सक्सेना का साया उनके उपर से उठ गया. परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी इसलिए शुरुआत में इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर भी नौकरी की. लंबी बेरोजगारी के बाद दिल्ली जाकर सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी करने लगे.

सैकड़ों फिल्मी गीत, अनगिनत काव्य रचनाएं, और भी एक बड़ा साहित्य लिखने वाले गोपालदास नीरज लेखन को लेकर हमेशा ही असंतुष्ट रहे| कुछ अच्छा लिखने की ललक नीरज में अंतिम समय तक भी देखी गई| कवि सम्मलेन को पहचान दिलाने वाले और कवि सम्मलेन को आधी रात के बाद परवान पर ले जाने वाले कवियों में नीरज का नाम हमेशा से ही अग्रणी रहेगा|

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