स्वास्थ्य विभाग की तबीयत में नहीं हो रहा सुधार

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किसी भी देश की बुनियादी जरूरतों में बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था पहली प्राथमिकता होती है| किसी भी देश में स्वस्थ समाज का होना ही उसे समृद्ध बनाता है| भारत में आज़ादी के बाद से ही स्वास्थ्य व्यवस्था एक बड़ी चिंता का विषय है| समय-समय पर आती-जाती सरकारों ने देश की स्वास्थ्य सेवा को लेकर कई योजनाएं लागू की, लेकिन इनका प्रभाव आज तक ज़मीनी स्तर पर नहीं देखा जा रहा है| देश में आज भी कई जगहों पर अस्पताल उपलब्ध नहीं हैं और गंभीर बीमारियों से हो रही मौतों की संख्या में भी कोई कमी नहीं आई है|

विश्व स्तर पर बात करें तो भारत विश्व मेडिकल टूरिज्म के क्षेत्र में अच्छे और सस्ते इलाज के लिए उभर रहा है| यदि देखा जाए तो यह तथ्य भी भ्रम ही लगता है| भारत ने जहां छोटे बीमारियों के इलाज के लिए खुद को विकसित कर लिया  वहीं बड़ी बीमारियां देश के मध्यम वर्ग की कमर तोड़ देते हैं|

हालात ये हैं कि यदि इलाज न हो तो मौत और यदि इलाज हो तो खर्च के बोझ से मौत| यदि मध्यमवर्गीय परिवार में किसी को बड़ी बीमारी हो जाए तो बीमार व्यक्ति शारीरिक तौर पर टूट जाता है| पूरा परिवार मानसिक और आर्थिक रूप से टूट जाता है| तमाम प्रयासों के बाद भी देश का स्वास्थ्य तंत्र अस्पतालों और डॉक्टरों की कमी, महंगी दवाई, व्यवस्था की मनमानी, दूरदर्शी सोच की कमी जैसी कई बीमारियों से पीड़ित है|

पिछले चार सालों में कवायदें तो देखने को मिलीं, लेकिन उनके नतीजे आने बाकी हैं| हालांकि मौजूदा केंद्र सरकार की सफलता-असफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वे भारत की जनता के इलाज की गारंटी सुनिश्चित कर पाती है या नहीं|

लचर स्वास्थ्य व्यवस्था का ढांचा

हाल ही में जारी नेशनल हेल्थ प्रोफाइल के अनुसार, भारत में 11 हज़ार से अधिक लोगों के लिए केवल 1 डॉक्टर मौजूद है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन का मापदंड एक हज़ार लोगों पर एक डॉक्टर का है| यह अपने आप में देश के स्वास्थ्य विभाग की सबसे बड़ी विफलता है| यही नहीं देश में 55 हजार से भी अधिक की आबादी पर एक सरकारी अस्पताल है| 1800 से अधिक आबादी पर सरकारी अस्पताल का एक बेड उपलब्ध हैं| इनमें भी सभी सरकारी अस्पतालों में कितने सरकारी डॉक्टर उपलब्ध हैं और कितने निजी प्रैक्टिस कर रहे हैं, यह एक अलग जांच का विषय है|

विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि हर व्यक्ति तक सहज इलाज पहुंचाने के लिए देश में कम से कम 5 लाख डॉक्टरों की तत्काल जरूरत है| देश में मेडिकल शिक्षा के लिए उत्तरदायी संस्था मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया खुद भ्रष्टाचार का अड्डा बनकर रह गया है| देश में डॉक्टरों की उपलब्धता का आलम यह है कि देश में हर साल महज 67 हज़ार एमबीबीएस डॉक्टर और 31 हज़ार पोस्ट ग्रेजुएट डॉक्टर निकल पाते हैं| महंगे इलाज के चक्कर में हर वर्ष लाखों परिवार गरीबी रेखा से नीचे आते जा रहे हैं| वहीं स्वास्थ्य बीमा की सोच गांव तो क्या शहर में भी नहीं पनप पा रही है|

ऐसी स्थिति में सरकार के लिए स्वास्थ्य तंत्र को पटरी पर ला पाना कोई आसान काम नहीं है| केंद्र सरकार के 4 साल भले ही इन कमियों को पूरा करने की कोशिशों के नाम रहे हों, लेकिन देश अभी भी नतीजों का इंतज़ार कर रहा है|

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