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महाराष्ट्र में सत्ता की शह और मात, अब गडकरी के हाथ

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वादा करके भूल जाना, बागी होकर चुनाव लड़ना फिर वापस दल में शामिल हो जाना, सदस्य को पार्टी से निकलना फिर हार पहना कर अपना लेना यही है वर्तमान भारत की असल राजनीति जिसका सबसे ज्वलंत उद्धरण बन गया है महाराष्ट्र। केवल 56 सीटें जीतकर भी शिवसेना का मानना हैं कि प्रदेश की जनता आदित्य को सीएम बनता देखना चाहती है। अगर ऐसा होता तो बीजेपी को 105 सीटें ना आती। खैर महाराष्ट्र की राजनीति में जारी घमासान के बाद अब एक नया पहलू सामने आ रहा है। शिवसेना और बीजेपी की तकरार के बीच आरएसएस नेताओं की कई बार बैठक हुई और दोनों दलों को यह आश्वास्न दिया गया कि सूबे की राजनीति में जल्द ही सब कुछ ठीक कर दिया जाएगा, लेकिन जितना आश्वासन दिया गया उतनी ही बीजेपी और शिवसेना की दरार बढ़ती गई। महाराष्ट्र की राजनीति में बने इस हालातों के बाद अब नया सवाल सामने आया है कि कहीं ये सब किसी और के द्वारा सत्ता की चाह मे तो नहीं किया जा रहा है।

क्या गडकरी ने बिछाई है शतरंज की ये बिसात ?

अब नया सवाल यह खड़ा हो रहा है कि क्या आरएसएस से संबंध रखने वाले केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी महाराष्ट्र के नए बादशाह बनना चाहते हैं? भले ही उन्होने मीडिया के सामने यह कहा कि वे दिल्ली नहीं छोड़ेंगे, लेकिन उन्होने यह भी कहा था कि जरूरत पड़ने पर मैं दोनों पार्टियों के बीच मध्यस्थता करवाऊंगा। हमने शिवसेना के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा और हम ही सरकार बनाएंगे। बाला साहेब के समय भी सीएम पद को लेकर खींचतान हुई थी, तब हमने तय किया था कि जिसके सबसे अधिक विधायक होंगे, सीएम पद उसके ही खाते में जाएगा।

केंद्र में बड़ा पद होने के बावजूद मुख्यमंत्री के रुतबे की चाह शायद गडकरी के अंदर भी जिंदा है। अब देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आखिर महाराष्ट्र की राजनीति का ऊंठ किस करवट बैठता है और काफी लंबी चली इस खीचतान का आखिर क्या नतीजा निकलता है। क्या राजनीति की ये सारी उठा-पठक, शिव-सेना का रूठना, बीजेपी का मानना, आरएसएस की दखलंदाजी और फिर गडकरी की एंट्री, क्या ये एक सोची समझी रणनीति है? फडणवीस की जगह गडकरी को मुख्यमंत्री बनाने की।

रंजीता पठारे / विश्वम्भर नाथ तिवारी

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