मोदी सरकार ने दंगाईयों को बचाने के लिए जज को ही हटा दिया

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दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस (Delhi High Court Justice S. Murlidhar)   हैं एस. मुरलीधर। इन्होंने दिल्ली हिंसा (Delhi Riots 2020) में घायलों को समुचित इलाज और सुरक्षा मुहैया कराने की मांग वाली याचिका (Modi Government Transferred Justice Murlidhar) पर आधी रात को सुनवाई की थी। और भाजपा (BJP) नेताओं के खिलाफ दंगा भड़काने के आरोप में मुकदमा दर्ज करने के भी आदेश दिए थे। इस तरह के निर्देश देने का यह परिणाम रहा कि  दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) के जज जस्टिस एस मुरलीधर का तबादला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट (Punjab and Haryana High Court)  में कर दिया गया है। बुधवार 26 फरवरी को उन्होंने इस मामले की सुनवाई गुरुवार तक के लिए स्थगित कर दी थी, बाद में इस मामले की सुनवाई को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष स्थान्तरित कर दिया गया था।

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सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस (Delhi Police) को फटकार लगाने वाले जस्टिस एस मुरलीधर (Modi Government Transferred Justice Murlidhar) का तबादला क्यों किया गया यह बात अब सभी को गले नहीं उतर रही है। राष्ट्रपति भवन से जस्टिस एस मुरलीधर के तबादले की अधिसूचना भी जारी कर दी गई है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद (President Ramnath Kovind) ने भारत के मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबड़े के साथ परामर्श करने के बाद जस्टिस एस मुरलीधर का तबादला दिल्ली उच्च न्यायालय से पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में किया है। इसके साथ ही उन्हें अपने कार्यालय का प्रभार संभालने का निर्देश भी दिया है। इसके पीछे कारण बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम (Supreme Court) ने 12 फरवरी को हुई अपनी बैठक में दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस एस मुरलीधर (Justice S. Murlidhar) को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने की सिफारिश की थी। इसके तहत जस्टिस मुरलीधर (Justice Murlidhar) का तबादला किया गया।

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बुधवार को न्यायमूर्ति एस मुरलीधर (Modi Government Transferred Justice Murlidhar) और न्यायमूर्ति तलवंत सिंह ने कहा था कि ‘‘पुलिस जब आगजनी, लूट, पथराव की घटनाओं में 11 प्राथमिकी दर्ज कर सकती है, तो उसने उसी तरह की मुस्तैदी तब क्यों नहीं दिखाई जब भाजपा के तीन नेताओं -अनुराग ठाकुर (Anurag Thakur) , प्रवेश वर्मा (Parvesh Verma)  और कपिल मिश्रा (BJP Kapil Mishra)के कथित नफरत वाले भाषणों का मामला उसके पास आया।‘‘ पीठ ने कहा था, ‘‘ हम शांति कायम करना चाहते हें। हम नहीं चाहते हैं कि शहर फिर से 1984 की तरह के दंगों का गवाह बने। शहर काफी हिंसा और आक्रोश देख चुका है …1984 को दोहराने मत दीजिए।‘‘ दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने कहा था कि ‘‘हम अभी भी 1984 के पीड़ितों के मुआवजे के मामलों से निपट रहे हैं, ऐसा दोबारा नहीं होना चाहिए। नौकरशाही में जाने के बजाय लोगों की मदद होनी चाहिए। इस माहौल में यह बहुत ही नाजुक काम है, लेकिन अब संवाद को विनम्रता के साथ बनाए रखा जाना चाहिए।‘‘ अदालत मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर और फराह नकवी की एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। इसमें संशोधित नागरिकता कानून (CAA Protest) को लेकर उत्तर-पूर्वी दिल्ली के विभिन्न हिस्से में भड़की सांप्रदायिक हिंसा (Delhi Violence) में संलिप्त लोगों को गिरफ्तार करने और प्राथमिकी दर्ज करने के निर्देश देने का अनुरोध किया गया। हिंसा में 22 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 200 लोग घायल हुए हैं।

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Rahul Tiwari / Prabhat Jain

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