हिन्दुस्तान में हिन्दी अनिवार्य नहीं !

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मोदी सरकार (Modi government) के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत होते ही नई शिक्षा नीति पर विवाद शुरू हो गया है। नए शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक (Ramesh Pokhriyal) ने कहा है कि किसी भी भाषा के लिए किसी के ऊपर दबाव नहीं बनाया जा सकता। शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में दक्षिण के राज्यों में तीन भाषा फॉर्मूला लागू करने में हिंदी भाषा को अनिवार्य करने पर बवाल हो गया है। मानव संसाधन मंत्रालय (Ministry of Human Resource Development)  ने ड्राफ्ट रिपोर्ट में बदलाव किया है। इस बदलाव के अनुसार, अब पढ़ने के लिए हिंदी अनिवार्य नहीं है।

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जानकारी के अनुसार, शिक्षा नीति के नए ड्राफ्ट के अनुसार, अब 5वीं क्लास तक हिंदी पढ़ना अनिवार्य नहीं होगा। अब छात्रों के पास विकल्प रहेगा कि वे तीन में से कोई भी एक भाषा का चुनाव कर सकते हैं।  ये बदलाव हिन्दी भाषा के दक्षिण के राज्यों में विरोध को देखते हुए किया गया है। तमिलनाडू, कर्नाटक सहित महाराष्ट्र में हिंदी को अनिवार्य करने का पीछे काफी समय से विवाद हो रहा है। इसीलिए अब हिन्दी की अनिवर्यता को हटा दिया गया है।

अब पढ़ाई के लिए भी तीसरी भाषा किसी पर थोपी नहीं जा सकती है। इसमें छात्र अपने स्कूल, टीचर की सहायता ले सकता है, यानी स्कूल की ओर से जिस भाषा में आसानी से मदद की जा सकती है छात्र उसी भाषा पर आगे बढ़ सकता है। शनिवार को केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने स्पष्ट किया था कि सरकार अपनी नीति के तहत सभी भारतीय भाषाओं के विकास को प्रतिबद्ध है और किसी प्रदेश पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी।

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निशंक ने कहा था, “हमें नई शिक्षा नीति का मसौदा प्राप्त हुआ है, यह रिपोर्ट है। इस पर लोगों एवं विभिन्न पक्षकारों की राय ली जायेगी, उसके बाद ही कुछ होगा।  कहीं न कहीं लोगों को गलतफहमी हुई है। हमारी सरकार, सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करती है और हम सभी भाषाओं के विकास को प्रतिबद्ध है। किसी प्रदेश पर कोई भाषा नहीं थोपी जाएगी। यही हमारी नीति है, इसलिए इस पर विवाद का कोई प्रश्न ही नहीं है। कुछ लोग इसे लेकर राजनीतिक विवाद पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि ऐसा कुछ नहीं है। अभी तो यह केवल मसौदा है। ”

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