दिवंगत संत की अंतिम यात्रा में राजनेता नदारद

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राष्ट्रसंत भय्यू महाराज से राजनेताओं की दूरियां क्यों ? यह प्रश्न उन हजारों लोगों के दिलोदिमाग में कुलबुला रहा है, जो दिवंगत संत के अंतिम दर्शनों के लिए सूर्योदय आश्रम पहुंचे थे | बुधवार को सुबह 9 बजे से दोपहर 2 बजे तक पूरे 5 घंटे भय्यू महाराज की पार्थिव देह दर्शनार्थ रखी गई थी, परंतु न तो राष्ट्रीय स्तर के नेताओं का हुजूम महाराज के अंतिम दर्शन के लिए पहुंचा, न ही प्रादेशिक और न ही स्थानीय नेताओं ने बड़ी संख्या में पहुंचकर संत के अंतिम दर्शन कर उन्हें श्रद्धांजलि देना उचित समझा|

भय्यू महाराज के दो दशक से अधिक के आध्यात्मिक जीवन में उनसे सैकड़ों की संख्या में राजनेता मिले और उनका आशीर्वाद लेकर अपना मार्ग प्रशस्त किया, लेकिन संत की खुदकुशी के बाद अचानक ही राजनेताओं ने दूरियां बना लीं| संत के अंतिम दर्शन के लिए इतने राजनेता पहुंचे, जितने कोई भी अंगुलियों पर गिन ले |

अनेक राजनेताओं के मार्गदर्शक के रूप में काम करने वाले राष्ट्रसंत भय्यू महाराज ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनकी अंतिम यात्रा वीवीआईपी और वीआईपी विहीन होगी| वे तो राजनेताओं के एक इशारे पर कभी अन्ना हजारे का अनशन तुड़वाने पहुंचते थे तो कभी गुजरात के सीएम रहे नरेंद्र मोदी को ज्यूस पिला आते थे| और तो और वे तो प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह के आग्रह पर कभी भी आंदोलन से पीछे नहीं हटने वाली ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की नेत्री समाजसेविका मेधा पाटकर तक को मनाने पहुंच जाया करते थे | कभी 50-50 वाहनों के क़ाफिले के साथ महाराष्ट्र में भ्रमण कर मुख्यमंत्री सहित अनेक केंद्रीय मंत्रियों और दर्जनों मंत्रियों को एक मंच पर लाकर अनेक आयोजन करने वाले महाराज की अंतिम यात्रा में कोई बड़ा नाम शामिल नहीं हुआ|

मुट्ठीभर नेता रहे मुखाग्नि के समय

राष्ट्रसंत भय्यू महाराज के अंतिम संस्कार के समय मुट्ठीभर नेता मुक्तिधाम में मौजूद रहे, जिनमें से कुछ नाम महाराष्ट्र से थे तो कुछ स्थानीय, लेकिन मध्यप्रदेश और गुजरात के किसी भी बड़े राजनेता ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवाई | मुक्तिधाम में कुछ स्थानीय नेता जरूर दिखाई दिए, जो विपक्ष में है, लेकिन यहां विपक्ष के बड़े नेता भी  सत्ताधारी राजनेताओं की तरह ही अंतिम दर्शन, अंतिम यात्रा और मुक्तिधाम से नदारद ही रहे| संत के अंतिम समय में वे नाम दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आए, जिनके करीबी होने का अहसास अवाम को था| वे चेहरे अंतिम समय में परिजन को सांत्वना देते नहीं दिखाई दिए, जो हर बड़े- छोटे आयोजन में सूर्योदय आश्रम के सजने वाले मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर संत के करीबी होने का दावा किया करते थे | उनकी अंतिम विदाई में किसी भी बड़े राजनेता के नहीं पहुंचने से स्वार्थपूर्ण राजनीति का एक नया रूप सामने आया है|

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