1.11 करोड़ बच्चे नहीं मना पाए अपना 5वां जन्मदि‍न, क्यों ?

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देश में बच्चों पर बीमारियां काल बनकर अपना कहर बरसा रही है। बिहार (Bihar) और देश के कई राज्यों में चमकी बुखार ( Chamki fever) और लू के कारण 150 से ज्यादा बच्चों की मौत (Child Infant Death Mortality Rate) हो चुकी हैं। यदि हम पिछले आठ सालों के आंकड़ों को देखें तो स्थिति और चौंकाने वाली होगी। करोड़ों बच्चे ऐसे होते हैं,जो अपने जीवन के पांच साल भी पुरे नहीं कर पाते हैं। अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission of India) ने ऐसे आंकड़े पेश किये हैं, जो देश में बच्चों की चिंताजनक स्थिति के बारे में बता रहे हैं।

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 भारत सरकार (Indian government) के सैंपल रजिस्ट्रेशन सर्वे (SRS) से मिली जानकारी के अनुसार (Child Infant Death Mortality Rate), वर्ष 2008 से 2015 के बीच 1.11 करोड़ बच्चों की मौत पांच साल की उम्र पूरी करने से पहले ही हो गई। 56% बच्चों की मौत नवजात अवस्था में तथा 62.40 लाख बच्चों की मौत जन्म के पहले महीने में ही हो गई। जहाँ वर्ष 2008 में पांच साल से कम के 50.9 प्रतिशत बच्चों की मौत हुई वहीँ 2015 में यह संख्या बढकर 58.1 प्रतिशत हो गई थी। 2008 से 2015 के बीच हर घंटे औसतन 89 नवजात शिशुओं की मृत्यु होती रही है। 2008 से 2015 के दौरान देश में 91 लाख बच्चे पहला जन्मदिन ही नहीं मना पाए। इस अवधि में शिशु मृत्यु दर 53 से घट कर 37 पर आई है, लेकिन वर्ष 2015 में ही 9.57 लाख बच्चों की मृत्यु हुई थी।

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बच्चों की मौत (Child Infant Death Mortality Rate) के प्रमुख कारण तथा प्रतिशत –

समय से पहले जन्म लेने के कारण होने वाली जटिलताओं के कारण मौत  – 43.7 प्रतिशत
निमोनिया, सेप्सिस और अतिसार यानी संक्रमण के कारण- 20.8 प्रतिशत
विलंबित और जटिल प्रसव के कारण – 19.2 प्रतिशत
जन्मजात असामान्यताओं के कारण – 8.1 प्रतिशत

देश के चार बड़े राज्य, जिसमें बच्चों की मौत का प्रतिशत 56 प्रतिशत रहा –

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उत्तर प्रदेश – 16.84 लाख
बिहार – 6.64 लाख
मध्यप्रदेश – 6.18 लाख
राजस्थान – 5.12 लाख
आंध्र प्रदेश – 3.35 लाख
गुजरात – 2.95 लाख
महाराष्ट्र – 2.92 लाख
झारखंड – 1.70 लाख

देश में बच्चों की मौत का आंकड़ा तेजी से बढ़ता जा रहा है। करोड़ों बच्चे प्रशासन की लापरवाही और अनदेखी के कारण काल के गाल में समा चुके हैं, फिर भी उनकी ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।  कई प्राथमिक सेवाओं और सुविधाओं के अभाव में बच्चों की जान चली जाती है।

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