एक मुसलमान जो पढता है रामायण

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लोकसभा चुनाव (Lok Sabha elections 2019) के लिए 5 चरणों के मतदान संपन्न हो चुके हैं। अब चुनाव के लिए केवल 2 चरणों के मतदान शेष रह गए हैं। ऐसे में राजनीतिक दल अपनी पूरी ताकत लगाकर प्रचार कर रहे हैं। जहां मध्यप्रदेश में चुनाव भगवा पर आधारित हो गया है तो वहीं उत्तरप्रदेश में राम मंदिर की लड़ाई है। कुल मिलाकर कहा जाए तो सभी नेता वोट पाने के लिए भगवान का सहारा लेने से भी परहेज नहीं करते। फिर चाहे उन्हें वोट अली के नाम पर मिलें या फिर बजरंगबली के। वोट पाने के लिए धर्म और जाति की दुहाई देने वाले दलों को परे रखकर, मिर्जापुर के बाबू खान ने एक मिसाल पेश की है। अलीगढ़ में अनूपशहर रोड स्थित मिर्जापुर गांव के निवासी बाबू खान और अबरार अली और बजरंगबली में कोई फर्क नहीं समझते।

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यह दोनों मुस्लिम समुदाय के लोग सुबह मस्जिद में जाकर नमाज़ अदा करते हैं। मस्जिद से लौटते ही यह शिव मंदिर पहुंच जाते हैं, और पूरे विधि-विधान के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा करते हैं। जब वे रामचरित मानस का पाठ करते हैं, तो उनके मुंह से चौपाई सुन सभी मंत्र मुग्ध हो जाते हैं। रामचरित मानस का जब ये दोनों पाठ करते हैं तो लोगों को स्वयं प्रभु श्री राम की अनुभूति होती है। वहीं जब यह कुरान की आयतें सुनाते हैं तो लोगों को रहीम की याद आ जाती है। इनके मुंह से शिव पुराण सुनकर तो सभी लोग दंग रह जाते हैं। सांप्रदायिक सौहार्द की यह अनोखी मिसाल पूरे क्षेत्र के लोगों के लिए गर्व की बात है।

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इस मंदिर का निर्माण भी खुद बाबू खान ने साल 2013 में करवाया था। इसके लिए उन्हें किसी ने प्रेरित नहीं किया। दरअसल सीडीएफ (CDF) चौकी के पास का रास्ता बेहद ही ऊबड़ -खाबड़ था और लोग इस रस्ते पर जाने से डरते थे। यह बात प्रधान शमा परवीन के पति बाबू खान को नागवार गुजरती थी। इसी वजह से उन्होंने क्षेत्रवासियों की अनुमति लेकर यहां शिव मंदिर का निर्माण करवा दिया। यह मंदिर 20 गज की जगह पर बनाया गया। इस मंदिर के निर्माण का पूरा खर्चा खुद बाबू खान ने वहन किया। इस मंदिर के निर्माण के लिए उन्होंने कारीगर और संगमरमर को दिल्ली से मंगवाया था।

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हालांकि बाबू खान के इस कार्य की जहां गांववासियों ने काफी सराहना की वहीं कई लोगों ने इस पर सवाल भी उठाए। लोगों द्वारा उठाए गए सवालों से बाबू खान जरा भी नहीं घबराए। उन्होंने कहा कि अली और बजरंगबली के नाम पर विवाद फिजूल है। उनका कहना है कि ऊपर वाला एक है। जब उसके दरबार में किसी तरह का कोई भी भेद नहीं है तो फिर भला हम क्यों करें? इंसानियत से बड़ा कुछ नहीं होता। उनका कहना है कि गांव में हिंदू-मुस्लिम भाइयों की तरह रहते हैं और यही हम सभी की ताकत है। उनके पांच बेटे और तीन बेटियां मंदिर की सफाई व देखरेख में उनकी मदद करती हैं। उन्हें तीन बार गंगा जमुनी पुरस्कार से भी प्रशासन द्वारा नवाजा जा चूका है।

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