शिवराज सिंह की अधूरी सरकार और कुर्सी की लालसा ने भी बिगाड़े हालात

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मध्यप्रदेश में कोरोना वायरस को लेकर स्थिती लगातार भयावह होती जा रही है। आपको बता दें कि मध्यप्रदेश में कोरोना के मरीजों की यदि बात करें तो कुल संख्या 453 है। जिनमें से 36 की मृत्यु हुई है।
इंदौर में 229, जबलपुर में 9, भोपाल में 124, उज्जैन में 12, ग्वालियर में 2, शिवपुरी में 2, खरगोन में 14, मुरैना में 12, छिंदवाड़ा में 2, बड़वानी में 14, विदिशा में 13, बैतूल में 1, होशंगाबाद में 6, श्योपुर में 01, रायसेन में 1, देवास में 3, धार में 1, खंडवा में 4, सागर में 1 तथा शाजापुर में 1 कोरोना संक्रमित मरीज है।
ऐसे में मध्यप्रदेश में जो हालात बिगड़े हैं, जरा उन पर भी विचार करना चाहिए। कैसे एक मजबूत तंत्र के रहते हुए देश के एक ऐसे प्रदेश में जो आसपास के कई दूसरे प्रदेशों से लगा हुआ है वहां हालात खराब हुए।
कोरोना के संकट के बीच जहां सरकार को एक मजबूत प्रशासनिक और स्वास्थ्य तंत्र की जरुरत थी, वहां पर मध्यप्रदेश में सिंहासन पर बैठनेे की होड़ मची हुई थी। जिस दिन प्रदेश में सरकार को कोरोना को लेकर बैठक करनी चाहिए थी, उस दिन कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दलों के नेता अपने विधायकों को बचाने के लिए बैठकें कर रहे थे।
जहां डाॅक्टरों के लिए निर्देश जारी होने चाहिए थे, वहां नेता अपने विधायकों का समर्थन लेकर राज्यपाल के पास सरकार बनाने का दावा करने पहुंचे थे।
हुआ क्या कांग्रेस की सरकार गिर गई। मामा एक बार फिर, हमारे प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चैहान का नाम मामा है। मैं भी उसी हक से उन्हें कह रहा हूं। वे मुख्यमंत्री बन गए।
मामा ने मुख्यमंत्री बनते ही सबसे पहले कोरोना केे नियमों की धज्ज़ियां उड़ाई। उन्होंने विधायक दल की बैठक में बड़ी तादाद में विधायक और पदाधिकारी इकट्ठा किए और मोदी जी की सारी अपील जमीन पर रौंद दी।
इसके बाद लगातार सरकार बनने का जश्न मनता रहा। कार्यकर्ता जुलूस निकालते रहे। लगातार नेता मिलते जुलते रहे। ये तो इश्वर का आशीर्वाद है इन राजनीतिज्ञों पर कि इनमें से कोई भी इस खतरे का शिकार नहीं हुआ।
रही बात प्रशासनिक अमले की तो शिवराज सरकार के आते ही वह सब हुआ जिसका आरोप भाजपा वाले कुछ महीनों पहले तक कांग्रेस पर लगाते रहे थे। सीएम शिवराजसिंह चैहान ने आते ही प्रदेश में कई बड़े अधिकारियों को हटाया। इनमंे इंदौर जिले के कलेक्टर और डीआईजी भी थे। यहां के कलेक्टर लोकेश जाटव शुरु से ही राजनीति का शिकार होते आए थे। शिवराज ने उन्हें कोरोना संकट के बीच ही इंदौर से हटाकर शिक्षा विभाग में सचिव बना दिया। जबकि उनकी जगह आए मनीष सिंह को शिवराजसिंह चैहान ने इंदौर की कमान दी। जिन्हें कांग्रेस ने उज्जैन कलेक्टर के पद से हटाया था। हम जानते हैं कि मनीष सिंह भी अच्छे अधिकारी हैं, लेकिन सभी जानते हैं कि सरकार की उन पर विशेष दृष्टी है।
वहीं रुचिवर्धन मिश्र को डीआईजी पद से हटाकर उनकी जगह हरिनारायण चारी मिश्र को डीआईजी बनाया गया है। दोनों ही बदलाव कोरोना संकट के बीच हुए।
सत्ता के लालच में दोनों ही दल यह तो भूल ही गए थे कि मध्यप्रदेश में कोरोना जैसा संकट भी आ सकता है। इसके लिए पहले से प्रदेश में कोई तैयारियां नहीं थी। ना ही सरकारी डाॅक्टरों को अलर्ट पर रखा गया था। ना ही अस्पतालों में आईसोलेशन सेंटर बनाए गए थे। ये सभी तैयारियां तब हुई जब मध्यप्रदेश में सबसे पहले जबलपुर में मामले सामने आ गए।
इसके अलावा डाॅक्टरों का कोई विशेष प्रशिक्षण भी कोरोना को लेकर नहीं हुआ। नतीजा निकला कि दो डाॅक्टर जो इंदौर के थे। वे ही कोरोना से जंग में हार गए और उन्हें हमने खो दिया।
कुल मिलाकर कमियां कई हैं, गिनाएंगे तो लगेगा कि हम किसी की गलतियां निकालने ही बैठे हैं, लेकिन फिर भी मध्यप्रदेश में जो हालात बने हैं उसमें प्रदेश की संक्रमित राजनीति की भी अच्छी खासी भूमिका है।
शिवराजसिंह चैहान जो 15 साल राज करने के बाद भी 15 महीनों से सत्ता के लिए कोशिशों मंे लगे हुए थे। अब उनके पास राजनीति का अनुभव भी है और मुख्यमंत्री पद की कुर्सी भी। उम्मीद है कि मामा अपने प्रदेश को बचा लेंगे।

-Rahul Kumar Tiwari

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