उपचुनाव को लेकर कांग्रेस की रणनीति क्या है, इस खबर से समझिए

0

मध्यप्रदेश(Madhya Pradesh) में 15 साल का सूखा देखने के बाद कांग्रेस(MP congress) मात्र 15 महीनों के लिए सत्ता में आई थी। इस बीच कांग्रेस की सरकार इस तरह से गिर जाएगी इसका अंदाजा भी किसी को नहीं था, लेकिन फिर भी यह विचार है कि क्या कांग्र्रेस(Congress) के वरिष्ठ नेता इतनी आसानी से प्रदेश में हार मान गए या फिर उनके दिमाग में कुछ और चल रहा है( Congress By Election Strategy)
कांग्रेस में हुई बगावत के बाद सभी को यह उम्मीद थी कि मुख्यमंत्री कमलनाथ(CM Kamal Nath) कुछ भी करके अपनी सरकार को बचा लेंगे, लेकिन सारे राजनीतिक अनुमान फेल हो गए और नई सरकार बनाने वाली भाजपा ने मुख्यमंत्री के तौर पर शिवराज सिंह चौहान(Shivraj Singh Chouhan) को चैथा मौका दिया है।

शिवराज नहीं मानते प्रधानमंत्री की बात

आगे क्या होगा? –
बागी विधायकों(Rebel MLA’s) के इस्तीफे के बाद अब राज्य में उन सीटों पर उपचुनाव(Madhya Pradesh By Election) की नौबत आएगी तो क्या कांग्रेस उन सीटों पर जीत दर्ज करके फिर से सत्ता में वापसी कर सकती है?
जवाब यहां है?
प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बन सकती है, इस बात को बल कमलनाथ(Kamalnath) के इस्तीफे वाले दिन ही मध्य प्रदेश कांग्रेस के ट्विटर हैंडल(Congress Twitter) द्वारा किए गए उस ट्वीट से मिल सकता है। जहां लिखा गया था कि यह अल्प विराम है और आने वाले स्वतंत्रता दिवस पर कमलनाथ ही मुख्यमंत्री के तौर पर झंडा फहराएंगे।
कुछ ऐसा ही ट्वीट अगले दिनों में पूर्व मंत्री जीतू पटवारी ने भी किया और उन्होंने भी कांग्रेस के सत्ता से जाने को अल्पविराम बताते हुए जल्द ही वापसी की उम्मीद जताई।
यदि वर्तमान विधानसभा(Vidhan Sabha) के गणित को समझें तो 230 सदस्यीय विधानसभा में से जौरा और आगर-मालवा सीट पिछले कुछ महीनों से खाली हैं क्योंकि इन सीटों के निर्वाचित विधायकों का बीते दिनों निधन हो गया था। वहीं सिंधिया खेमे के 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद सदन में सदस्यों की संख्या 206 रह जाती है।
बीते गुरुवार देर रात ही भाजपा के एक अन्य विधायक शरद कौल का इस्तीफा भी विधानसभा स्पीकर द्वारा स्वीकार कर लिया गया था।
शरद कौल(Sharad Kaul) के इस्तीफे पर विवाद कायम है क्योंकि राज्य सरकार में भाजपा को वापसी करते देख शरद दावा कर रहे हैं कि उनका इस्तीफा कांग्रेस द्वारा दबाव में लिखवाया गया था।
इसलिए भाजपा शरद कौल की सदस्यता बचाने में जुट गई है। विधायक कौल और भाजपा ने इस संबंध में राज्यपाल लालजी टंडन(Lalji Tandon) को भी सूचित किया है कि तत्कालीन स्पीकर ने द्वेषपूर्ण कार्रवाई करके शरद कौल का इस्तीफा मंजूर किया था।
इस तरह शरद कौल के इस्तीफे के कारण वर्तमान सदन संख्या 205 मानी जाएगी और भाजपा विधायकों की संख्या 106। जो किसी वर्तमान हालातों में बहुमत के लिए आवश्यक 103 सीटों से अधिक है और भाजपा अकेले दम पर ही बहुमत के आंकड़े पर है।
वहीं, बागी 22 विधायकों के इस्तीफे के बाद कांग्रेस के पास 92 विधायक बचे हैं। इसके अलावा सदन में 4 विधायक निर्दलीय हैं, 2 बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और एक समाजवादी पार्टी (सपा) से है।
भविष्य में इन खाली 25 सीटों पर उपचुनाव के बाद सदन संख्या फिर से 230 हो जाएगी और बहुमत का आंकड़ा होगा 116 सदस्य. कांग्रेस के पास 92 सदस्य हैं(Congress By Election Strategy)
पहले जो सपा-बसपा और निर्दलीय विधायकों के सहयोग से कांग्रेस सरकार चला रही थी। अबये विधायक भी कांग्रेस का साथ नहीं दे रहे हैं। सरकार बदलते ही इन विधायकों के सुर भी बदल गये हैं।
कमलनाथ सरकार में खनिज मंत्री निर्दलीय विधायक प्रदीप जायसवाल(Pradeep Jaiswal) कहते हैं कि पहले कांग्रेस सरकार में थी तो उसके साथ थे, अब क्षेत्र के विकास के लिए भाजपा के साथ काम करेंगे।
वहीं, एक अन्य निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा(Surendra Singh Shera) ने कमलनाथ के इस्तीफे(Kamalnath Resignation) के बाद कह दिया था कि क्षेत्र की जनता से चर्चा करके भाजपा के साथ जाने और न जाने का फैसला लेंगे।
इसलिए ऐसी संभावना भी नहीं कि विपक्ष में बैठने जा रही कांग्रेस के साथ सपा-बसपा और निर्दलीय विधायकों का साथ मुश्किल रहेगा। वे भी सत्ता के साथ ही सुर मिलाना चाहेंगे।

CM कमलनाथ के इस्तीफे से गिरी 15 महीनों की सरकार

इन हालातों में भाजपा(BJP) और मजबूत होगी और उसकी वर्तमान सदस्य संख्या 113 पहुंच जाएगी, जो कि 230 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत की संख्या 116 से महज तीन कम होगी।
इस तरह सपा-बसपा और निर्दलीय विधायकों के भी पाला बदलने से कांग्रेस का 2023 के पूर्णावधि चुनावों से पहले सत्ता वापसी का रास्ता मुश्किल नजर आता है।
क्योंकि अब अगर कांग्रेस को सरकार बनानी है तो उसे उपचुनावों वाली 25 में से 24 सीटों पर जीत दर्ज करनी होगी। जो कि कांग्रेस(Congress By Election Strategy) के केंद्रीय और प्रादेशिक संगठन की वर्तमान हालात देखते हुए असंभव लगता है।
जबकि भाजपा को उपचुनाव वाली 25 सीटों में से अकेले दम पर बहुमत पाने के लिए दस सीटें और गठबंधन के साथ बहुमत पाने के लिए 25 में से केवल 3 सीटें जीतनी होंगी।
इस बीच कयास लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस के एक और वरिष्ठ विधायक केपी सिंह भाजपा में शामिल हो सकते हैं। केपी सिंह पिछोर से विधायक हैं और कमलनाथ सरकार के दौरान वरिष्ठ होने के बावजूद मंत्री न बनाए जाने के चलते लगातार खफा रहे थे। अगर उनका भी इस्तीफा होता है तो सदन संख्या 204 पर ठहर जाएगी और 26 सीटों पर उपचुनाव की नौबत आएगी।
इस स्थिति में सदन में कांग्रेस के विधायक 91 रह जाएंगे और उसे बहुमत हासिल करने के लिए उपचुनाव में 26 में से 25 सीटें जीतनी होंगी।
इस बीच यदि शरद कौल यह साबित करने में कामयाब हो गए कि उनका इस्तीफा जबरन लिखवाया गया था, तो उस स्थिति में 24 सीटों पर उपचुनाव होगा. कांग्रेस सभी 24 सीटें जीतनी होंगी।
कांग्रेस के लिए चिंता की बात ये है कि इन 24 सीटों में से 16 सीटें तो ग्वालियर(Gwalior)-चंबल अंचल की हैं और यहां से सिंधिया बड़े नेता हैं। वे कांग्रेस को किसी भी हालत में यहां रोकने की कोशिश करेंगे।
अंचल में भाजपा के पास ज्योतिरादित्य सिंधिया(Jyotiraditya Scindia), जो इस क्षेत्र में कांग्रेस को अपने दम पर जिताते आए थे, के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और नरोत्तम मिश्रा जैसे नाम हैं।

भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष वीडी शर्मा(V. D. Sharma) भी इसी अंचल से हैं। इसलिए 2023 के अगले पूर्णावधि चुनाव(Election 2020) से पहले प्रदेश में कांग्रेस की वापसी मुश्किल लग रही है।
संभावना सिर्फ तभी बनती है जब कांग्रेस भी भाजपा की तरह कोई बड़ा जोड़-तोड़ करे। लेकिन कांग्रेस ऐसा करने की स्थिति में हो यह भी दिखाई नहीं दे रहा है।

-Rahul Kumar Tiwari

 

Share.