किस आधार पर संतों को दिया राज्यमंत्री का दर्जा

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शिवराज सरकार द्वारा पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने के मामले में इंदौर हाईकोर्ट ने सरकार से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने जवाब मांगा है कि आखिर किस आधार पर पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है। कोर्ट ने यह चेतावनी भी दी है कि दो सप्ताह में जवाब नहीं आया तो हर्जाना भी लगाया जा सकता है।

कोर्ट ने सरकार से इस संबंध में पहले भी जवाब मांगा था, लेकिन याचिका में जिस विभाग को पक्षकार बनाया गया था, उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। इसके बाद कोर्ट ने याचिकाकर्ता को इसमें संशोधन के लिए कहा था।

गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने करीब चार माह पहले पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देने की घोषणा की थी। इस मामले को लेकर याचिकाकर्ता रामबहादुर वर्मा ने एडवोकेट गौतम गुप्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की है। इसमें कहा गया है कि पहले से मंत्री परिषद गठित होने के बावजूद पांच संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देने से प्रदेश की जनता पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा।

याचिका में इस बात का भी उल्लेख है कि जिन संतों को राज्यमंत्री का दर्जा देने का निर्णय लिया गया, उनके चयन का आधार क्या था जबकि इनमें से ज्यादातर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले थे।

इन बाबाओं को मिला था दर्जा

सरकार ने नर्मदा किनारे के क्षेत्रों में पौधरोपण, जलसंरक्षण विषयों पर जनजागरुकता का अभियान चलाने के लिए विशेष समिति गठित की है। समिति सदस्य में नर्मदानंदजी, हरिहरानंदजी, कंप्यूटर बाबा, भय्यू महाराज और पं.योगेंद्र महंत को राज्यमंत्री स्तर का दर्जा दिया गया है। बता दें कि भय्यू महाराज ने गोली मारकर आत्महत्या कर ली है।

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