अतिकुपोषित बच्चा, वजन सिर्फ 3 किलो

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आज के समय में कुपोषण(kuposhan) अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के लिये चिंता का विषय बन गया है। सरकार ने करोड़ों रूपये  खर्च कर  तमाम योजनाएं और पोषण पुनर्वास केन्द्रों(analytics of malnutrition) की व्यवस्था की  है।  लेकिन ,फिर भी कुपोषण ने बच्चों को जकड़ रखा है।साल दर साल जिले में कुपोषित(kuposhan) बच्चे बढ़ते जा रहे है।

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हाल ही में   ‘भोपाल'(bhopal ) जिले से  50 किमी दूर ‘बैरसिया’ के ‘जूनापानी रुनाहा’ गांव में चार साल का एक अतिकुपोषित बच्चा मिला है। बच्चे का वजन महज तीन किलो है जो एक सामान्य एक साल के बच्चे का होता है। । आंगनबाड़ी (anganwadi) और आशा कार्यकर्ताओं ने बच्चे को अतिकुपोषित बच्चे की  श्रेणी(analytics of malnutrition) में रखा है। साथ  ही जब बच्चे की जानकारी आयोग के सदस्य बृजेश चौहान  को मिली तब उन्होंने महिला एवं बाल विकास विभाग के अफसरों को निर्देश  दे कर पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती के लिए भेज दिया।

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महिला एवं बाल विकास विभाग अधिकारी रामगोपाल यादव का एक बयान सामने आया जिसमे ,उनका कहना था कि  बच्चे को हम लोगो ने  एनआरसी (NRC )में भर्ती करवाया था। लेकिन , बच्चे का  परिवार  उसे वहां  भर्ती ही नहीं करवाना चाहता था अब इसमें हम भी क्या कर सकते है अगर उसके परीजन को ही उसकी फ़िक्र नहीं है। (analytics of malnutrition) सीएमएचओ ने भी बच्चे का इलाज करने कि  कोशिश  की लेकिन उसके परिजन तैयार ही  नहीं हुए।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक जनवरी 2016 से जनवरी 2018 के बीच राज्य में 57,000 बच्चों ने कुपोषण के कारण दम तोड़ दिया था और कुपोषण की वजह से ही श्योपुर ज़िले को भारत का इथोपिया कहा जाता है। (analytics of malnutrition) भारत में सबसे ज्यादा  कुपोषण के मामले में सिंहभूम, जमशेदपुर और खूंटी संसदीय क्षेत्र आते है।  देश में सबसे ज्यादा 60.9% कुपोषित (अंडर वेट) बच्चे सिंहभूम में हैं। वहीं 50% से ज्यादा बच्चों की लंबाई उम्र के अनुपात में कम है। सबसे ज्यादा 80% एनीमिया(ANEMIYA) पीड़ित बच्चे भी सिंहभूम क्षेत्र में मिले।

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आंकड़े महिला एवं बाल विकास विभाग(Women and child development department) के पोर्टल पर अपलोड अप्रैल 2019 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश (analytics of malnutrition) में करीबन 1084948 बच्चे मध्यम  कुपोषित है और 119574  बच्चे अतिकुपोषित है।‘ मध्यप्रदेश ( madhya pardesh  )में आदिवासी क्षेत्रों में मात्र 49784 आंगनवाड़ी (anganwadi) केन्द्र है जबकि वास्तविक आवश्यकता 1.10लाख्र केन्द्रों की है। इसी प्रकार शहरी क्षेत्रों में अब भी 16849 केन्द्रों की ज़रूरत है।

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