EOW की टीम ने जांच के लिए मारा छापा

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3 हजार करोड़ के ई-टेंडरिंग घोटाले में पहली एफआईआर दर्ज करने के बाद गुरुवार को EOW की टीम ऑस्मो कंपनी के ऑफिस में जांच के लिए पहुंचीं । टीम ने यहां कंपनी से जुड़े दस्तावेजों की जांच की। भोपाल के मानसरोवर कॉम्प्लेक्स में कंपनी के दफ्तर में अधिकारियों की टीम इस कार्रवाई को अंजाम दे रही है। दो डीएसपी के साथ 15 कर्मचारियों की टीम मौके पर कंपनी से जुड़े दस्तावेजों की जांच कर रही है। शुरुआती जानकारी सामने आ रही कि ये कंपनी केवल डिजिटल सिग्नेचर ही नहीं बनाती है, बल्कि अखबार भी निकालती है। जिसमें टेंडर्स की जानकारी दी जाती है। जांच के लिए पहुंचीं टीम को देखते ही सब घबरा गए। आनन-फानन में ऑफिस की लाइट बंद कर दी गई।

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कॉम्प्लेक्स के अंदर दुकानदारों ने बताया कि शनिवार को अश्विन शर्मा के घर आयकर विभाग के छापे के बाद से ही ऑस्मो संस्था के ऑफिस में ताले लगे हुए थे, जिन्हें आज ईओडब्ल्यू की टीम ने खुलवाया है। यह भी आशंका जताई जा रही है की आयकर छापे के बाद संस्था से कई अहम दस्तावेज हटाए गए हों।

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इस घोटाले को सरकारी अफसरों के डिजिटल सिग्नेचर में छेड़छाड़ करके ही अंजाम दिया गया था। इसलिए इस कंपनी की जांच कई मायनों में अहम हो जाती है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने बुधवार को इस मामले में मध्य प्रदेश सरकार के पांच विभागों के अधिकारियों-कर्मचारियों और दस निजी कंपनियों के संचालकों-मार्केटिंग अधिकारियों सहित अज्ञात नौकरशाहों और नेताओं के खिलाफ धोखाधड़ी और आईटी व भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में केस दर्ज कर कार्रवाई शुरू की है।

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मध्यप्रदेश इलेक्ट्रॉनिक्स विकास निगम ने सरकार की ऑनलाइन टेंडर प्रक्रिया में टेम्परिंग को लेकर अप्रैल 2018 में मुख्य सचिव को प्रतिवेदन भेजा था। इसमें जल विकास निगम के तीन टेंडरों सहित लोक निर्माण विभाग के दो, जल संसाधन के दो, प्रोजेक्ट इम्प्लीमेंटेशन यूनिट का एक और सड़क विकास निगम का एक टेंडर शामिल था, जिनमें छेड़छाड़ कर आठ कंपनियों को फायदा पहुंचाने का प्रयास किया गया। मुख्य सचिव ने ईओडब्ल्यू को प्रकरण सौंपा और तबसे ही जांच चल रही थी।

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आनन-फानन में EOW ने दर्ज की एफआईआर

ईओडब्ल्यू की शुरुआती जांच में कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी) की तकनीकी मदद ली गई थी। उसकी एक रिपोर्ट छह महीने में ईओडब्ल्यू को मिली थी, लेकिन दूसरी रिपोर्ट के लिए ईओडब्ल्यू ने इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम से जानकारी मांगी है। अभी सीईआरटी को जानकारी नहीं भेजी गई है।

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क्या है ई-टेंडर घोटाला?

सरकारी टेंडरों के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया बनाई गई थी। इसमें जिस विभाग के टेंडर होते थे, वहां टेंडर खोलने वाले अधिकारी और उससे जुड़े एक कर्मचारी का डिजीटल सिग्नेचर होता था। इनके अलावा कोई भी तीसरा व्यक्ति उसे बदलना तो दूर, टेंडर को खोलकर देख भी नहीं सकता था। मगर टेंडर प्रक्रिया से जुड़े लोगों की मिलीभगत से कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए ऑनलाइन प्रकिया में छेड़छाड़ की गई। अप्रैल 2018 में जिन नौ टेंडर में यह छेड़छाड़ की गई, उन्हें निरस्त कर पूरी प्रक्रिया दोबारा की गई।

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