मानसिक विकलांग बेटी के लिए जीती लड़ाई

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कहते हैं कि कानून सिर्फ सबूतों पर चलता है और दस्तावेजों के अभाव में कई बार आम नागरिक को ऐसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है कि व कानून से आस ही छोड़ देता है| ऐसा ही एक मामला इंदौर में सामने आया जब एक मां ने अपनी मानसिक विक्षिप्त बच्ची के लिए 4 साल पुरानी कानूनी लड़ाई जीती|

64 वर्ष की मानसिक रूप से कमजोर बेटी की आर्थिक सुरक्षा के लिए चार साल से कानूनी लड़ाई लड़ रही बुजुर्ग महिला ने आख़िरकार जीत हासिल कर ली है| 84 वर्ष की सेवानिवृत्त सहायक शिक्षक चाहती थीं कि उनके मरने के बाद बेटी को पेंशन मिले, पर कुछ दस्तावेज कम होने से सरकार बेटी को उत्तराधिकारी मानने के लिए तैयार नहीं थी|

लेकिन अब हाईकोर्ट ने पेंशन की राशि बेटी को देने के आदेश दिए हैं| साथ ही महिला को मानसिक रूप से परेशान करने के लिए महिला पर एक लाख रूपए का जुर्मना भी न्यायालय ने लगाया है|

शास्त्री नगर उज्जैन निवासी रिटायर सहायक शिक्षका कृष्णा गांधी के पति सुन्दरलाल गांधी का पहले ही निधन हो चुका है| उनकी 64 वर्षीय बेटी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है| कृष्णा 1992 से सेवानिवृत्त हो चुकी हैं| उसके बाद से उन्हें पेंशन मिल रही हैं| वे चाहती थीं कि उनके बाद उनकी बेटी को पेंशन का लाभ मिले| पीड़िता की ओर से पैरवी करने वाले वकील लक्ष्मीकांत पटने के मुताबिक शुक्रवार को न्यायालय ने अपना फैसला सुनाते हुए यह निर्णय दिया और जुर्माना लगाने के आदेश भी दिए| इस तरह एक महिला ने भले ही परेशान होकर शासन के साथ लड़ाई लड़ी लेकिन अपनी मानसिक कमजोर बेटी का भविष्य कर दिया|

कोर्ट ने पलटा सरकार का तर्क

अधिवक्ता पटने के मुताबिक इस मामले में महिला का अभ्यावेदन खारिज कर दिया गया था, जिसके बाद महिला ने 17 फ़रवरी 2017 को फिर से हाईकोर्ट में फैसले को चुनौती दी थी| इस मामले में राज्यसरकार ने एक सर्कुलर जारी किया था, जिसमे लिखा था कि 25 वर्ष पहले के मानसिक रूप से विकलांगता के दस्तावेज नहीं होने की दशा में पारिवारिक पेंशन का लाभ नहीं मिल सकता, इसके बाद  कोर्ट ने महिला की उम्र और उसकी बेटी का स्वास्थ्य देखते हुए महिला के पक्ष में अपना फैसला सुनाया|

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