मोदी अर्थव्यवस्था को लेकर बेफिक्र, आंकड़े कर रहे है कुछ और ही जिक्र  

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पांचवे लाक डाउन की शुरूआत में प्रधानमंत्री पीएम मोदी ने अगले छह महीनों में विश्व अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था के अधिक तेज़ी सुधर जाने की बात कही और बड़ी निश्चिंतता जताई. लेकिन यह कहा तक मुमकिन है और इसके पीछे तथ्य क्या है इस पर कोई टिप्पणी नही की . किसान, व्यापारी, उद्योग धंधो, कामगार, प्रवासी कामगारों और स्वरोजगार से जुड़े करोड़ों भारतीयों के नुकसान का आंकलन इतना मुश्किल है कि इसे स्पष्ट  करना लगभग नामुमकिन है . क्योकि सड़क पर बैठे चाय पकौड़े के  ठेले वाले से लेकर बड़ी-बड़ी फेक्टरीयों तक सब कुछ बंद है और इस नुकसान को किन आंकड़ो में तौला जा सकता है इसे लेकर अर्थशास्त्री लगातार चिंता में है.

साथ ही इसी क्रम में गुजरात सरकार के एडवोकेट जनरल ने कहा कि बड़े पैमाने पर टेस्टिंग करने से जनता में डर और घबराहट की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि अगर टेस्ट कराए जाएं तो 70 फीसदी आबादी कोविड-19 से संक्रमित मिलेगी. दूसरी तरफ स्वयं वित्त मंत्री ने स्वीकार किया, कि सरकार के पास प्रवासी मजदूरों का कोई आंकड़ा ही नहीं है. ऐसे में आत्मनिर्भर भारतका मोदी का नारा मजाक लगता है, क्योकि आंकड़ों की माने तो – 

70 साल का सबसे बड़ा रिवर्स माइग्रेशन जो शहरो से गावों की तरफ हुआ है असाधारण है .

फरवरी से अब तक बेरोजगारों की संख्या 12 करोड़ हो गई है जो तिगुनी है .

 लाक डाउन खुलने के बाद 15 करोड़ लोगो की नौकरी रहेगी या नही यह कोई नही जानता . 

आधा भारत बिना किसी नियमित आमदनी के घर पर बैठा है.

भारत की 90 फीसदी आबादी 2 डॉलर प्रतिदिन से कम आय वाली है .

 भारत सरकार कहती है कि 20 करोड़ रुपये या जीडीपी के 10 प्रतिशत के बराबर के आर्थिक पैकेज अब तक का सबसे बड़ा सहायता पैकेज है जबकि पीएम किसान नकद हस्तांतरण के तौर पर (1 लाख करोड़) और कॉरपोरेट टैक्स में कटौती (1.45 लाख करोड़) के तौर पर 2019 में दी गई राशि इससे अधिक थी .

आज भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर अपने ऐतिहासिक निचले स्तर पर फिसलकर 3.1 फीसदी पर आ गयी है..

वाही चीन 2020 में सकारात्मक जीडीपी वृद्धि दर्ज करने वाली एकमात्र बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर आगे आया है .

2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद चीन और भारत ने वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व किया था, जब भारत के पीएम एक अर्थशास्त्री ही थे .

 नोटबंदी और जीएसटी की मार भी अब देखने को मिल सकती है .

2019 में आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2006 से 2016 तक 27.1 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर निकाले गए. जबकि पिछले चार सालों में यह रफ़्तार कही निचे आ गई है.

ऐसे में लॉकडाउन 4.0 के बाद राष्ट्र के नाम लिखे एक सन्देश में पीएम मोदी ने लिखा,  ‘हमारे मजदूरों, प्रवासी कामगारों, लघु उद्योगों के दस्तकारों और शिल्पकारों, फेरीवालों और उनके जैसे उनके साथी देशवासियों को भीषण कष्ट उठाना पड़ा है. लेकिन हमें जतनपूर्वक यह सुनिश्चित करना होगा कि हम जिन परेशानियों का सामना कर रहे हैं, वे कहीं आपदाओं में न बदल जाएं.’ लेकिन 130 करोड़ की आबादी वाले देश के लिए भाषण से शासन नही किया जा सकेगा. क्योकि आंकड़ों में ऐसे ही कई और भी सत्य है जो पीएम के भाषण को सिरे से ख़ारिज करते है.

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