विधानसभा की राह में मालवा है बड़ा पड़ाव

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विधानसभा चुनाव जीतकर सभी दल अपनी सरकार बनाने का दावा कर रहे हैं, लेकिन इस जंग में एक बड़ा पड़ाव है, जिसे पार करना सभी राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश में चंबल-ग्वालियर, बुंदेलखंड, बघेलखंड, महाकौशल और सेंट्रल मध्यप्रदेश में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला है। इन इलाकों में एकतरफा किसी एक पार्टी की तरफ जाने की संभावनाएं कम ही नज़र आ रही हैं बल्कि राजनीतिक पंडितों की माने तो कांग्रेस पहले से कहीं आगे बढ़ रही है।

इसके अलावा चुनाव में अब सभी की निगाहें मालवा-निमाड़ पर है। मालवा-निमाड़ यानी इंदौर, उज्जैन, झाबुआ खरगोन, खंडवा और मंदसौर के आसपास का इलाका। इस इलाके में भाजपा पारंपरिक रूप से ताकतवर है।

अकेले इंदौर से ही लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन आठ बार से सांसद हैं। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के करीबी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय यहां के प्रमुख नेता हैं। मध्यप्रदेश भाजपा के कई वरिष्ठ नेता पारस जैन, अर्चना चिटनीस, अंतरसिंह आर्य, विजय शाह और बालकृष्ण पाटीदार भी इसी इलाके से आते हैं।

इधर, कांग्रेस की तरफ से चार पूर्व मंत्री सुभाष सोजतिया, नरेंद्र नाहटा, हुकुमसिंह कराड़ा और बाला बच्चन चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व सांसद सज्जनसिंह वर्मा और विजयलक्ष्मी साधौ भी यहीं से चुनाव मैदान में हैं। इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस के तेजतर्रार उपाध्यक्ष जीतू पटवारी भी इंदौर की राऊ सीट से चुनाव मैदान में थे। कांग्रेस ने जयस नेता डॉ. हीरालाल अलावा को भी मैदान में उतारा है। आदिवासी इलाकों में अलावा एक नई अपील के साथ उभरे हैं।

ये रहेगा सीटों का अंकगणित

इस इलाके से विधानसभा की 66 सीटें आती हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा को इनमें से 56 सीटें मिली थीं, वहीं कांग्रेस के पास महज 9 सीटें थीं यानी इस इलाके को हासिल करने के लिए कांग्रेस को मतदाताओं का दिल जीतना होगा। यदि कांग्रेस इस इलाके में 30 से 35 सीटें नहीं जीतती है तो उसके लिए भोपाल के वल्लभ भवन के दरवाजे नहीं खुलेंगे। 30 से 35 सीट जीतने का मतलब है कि आधा मालवा फतह करना। कांग्रेस ने जिस तरीके से इस बार मालवा में दम दिखाया था, उसे देखते हुए लग रहा है कि इस बार कांग्रेस ने जो टक्कर भाजपा को दी है, उसका परिणाम वोट के रुप में भी देखने को मिलेगा।

नेता भी जानते हैं मालवा-निमाड़ की अहमियत

मालवा-निमाड़ की इस संवेदनशील स्थित को भाजपा और कांग्रेस दोनों समझ रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने इसीलिए चुनाव अभियान की शुरुआत मालवा में किसान-मजदूर रैली से की थी। यहीं उन्होंने पहली बार किसानों का कर्ज माफ करने का वादा किया था। कांग्रेस ने निमाड़ को इसलिए चुनाव क्योंकि जून 2017 में मंदसौर में किसानों पर गोली चली थी और यह इलाका कृषि संकट और किसानों के गुस्से का केंद्र बन गया था।

इस नाजुक हालत को समझते हुए भाजपा ने भी मालवा को पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए अपने सारे नेताओं को काम पर लगा दिया था। वोटिंग से तीन दिन पहले से अमित शाह खुद यहां के हालात पर नज़र रखे थे। उस समय तक भाजपा को जो फीडबैक मिल रहा था, उसके मुताबिक प्रदेश की 47 सीटें ऐसी थीं, जिन पर पार्टी बेहद कांटे का मुकाबला मान रही थी। इन सीटों को भाजपा की तरफ मोड़ने के लिए आखिरी वक्त में हर दांव पार्टी ने चला। जहां ज़रूरत हुई पार्टी ने अपने बागियों को मनाया और जहां जरूरत आगे पड़ी वहां अपने प्रत्याशी को पीछे करके बागियों को बढ़ावा दिया, ताकि किसी सूरत में कांग्रेस का प्रत्याशी न जीत सके।

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