मालदीव के कठोर फैसलों से भारत से दूरी

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एक तरफ जहां भारत मालदीव की सहायता सिर्फ पड़ोसी देश होने के नाते कर रहा है वहीं दूसरी ओर चीन अपने व्यावसायिक फायदे के लिए मालदीव की सहायता कर रहा है। भारत और मालदीव के बीच अच्छे संबंधों पर चीन काफी समय से अपनी नज़रें गड़ाए बैठा है।  चीन को मालदीव से सिर्फ अपना व्यावसायिक और राजनीतिक लाभ है जबकि भारत के लिए इसका हिन्द महासागर में होना और हमारा पड़ोसी देश होना काफी अहम है।

भारत का मालदीव का हित चाहना चीन के लिए डर का विषय बना हुआ है और इसी कारण चीन भारत को लगातार नसीहत दे रहा है।

चीन के सरकारी अखबारों में छपे एक लेख में भारत को नसीहत दी गई है कि जिस तरह से भारत अपने रिश्ते रूस, अमरीका आदि से बना रहा है, वैसा ही अधिकार मालदीव को भी है।

मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को चीन का समर्थन हासिल है।  मालदीव में सैन्य सरकार आने के बाद वहां भारत की मौजूदगी लगातार कम होती गई और जून में भारत के साथ करार ख़त्म हो गया है और वह इसका नवीनीकरण नहीं करना चाहता है| इसी कारण यामीन ने कहा की भारत मालदीव से अपने कर्मियों एवं अपने अधिकारियों को वापस बुला ले।

हिन्द महासागर के लगभग सभी देशों को भारत काफी समय से सैन्य सहायता प्रदान कर रहा है, जो चीन को खल रहा था । इससे  अब भारत और मालदीव के रिश्तों में खटास आ रही है।

अब हालात बदल गए हैं राजनीतिक मोर्चे पर मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन को चीन ज़्यादा रास आ रहा है। मालदीव टाइम्स के मुताबिक़, इसकी शुरुआत राष्ट्रपति मोहम्मद वहीद के कार्यकाल में ही शुरू हो गई थी।

भारतीय फ़िल्म, फैशन, फूड की लोकप्रियता मालदीव में किसी से छिपी नहीं है| मालदीव के नागरिक हर साल भारत आते हैं| ख़ास कर इलाज के लिए भारत इनका सबसे पसंदीदा ठिकाना है। इस छोटे से द्वीप समूह की सुरक्षा में भारत की अहम भूमिका रही है।  1988 में राजीव गांधी ने सेना भेजकर मौमून अब्दुल गयूम की सरकार को बचाया था।  हाल ही में जब मालदीव के लोग पेयजल की समस्या से जूझ रहे थे तो प्रधानमंत्री मोदी ने पानी भेजा था। अब चीन से लगाव के चलते मालदीव सरकार ने भारत की पानी सहायता पर पानी फेर दिया।

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